पूनापैक्ट पर अम्बेडकर और गांधी में अन्तर्विरोध
रजनीश भारती
बहुतों को लगता है कि गांधी अछूतों को आरक्षण दिए जाने के विरुद्ध थे। मगर कम्युनल अवार्ड में अछूतों को केवल 77 सीटें थीं पूना फैक्ट में बढ़कर 148 कर दी गयीं? अगर गांधी अछूतों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ थे तो पूना पैक्ट में अछूतों की सीटें लगभग दोगुना क्यों कर दिया? मैं गांधी या अम्बेडकर को दलित हितैषी सिद्ध करने के चक्कर में नहीं हूं। सिर्फ आरक्षण की कसौटी पर कस कर किसी को दलित हितैषी या दलित विरोधी कहना ठीक नहीं है। क्यों कि आरक्षण के पीछे भी हम शोषक वर्ग की रणनीति देख रहे हैं। हमारा मानना है कि– “शोषक वर्ग की राजसत्ता उतनी ही मजबूत और टिकाऊ होती है, जितना कि वो शोषित पीड़ित वर्ग की प्रतिभाओं को आत्मसात करने में सक्षम होता है।” आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है, यह प्रतिनिधित्व का मामला भी नहीं, यह शोषित पीड़ित वर्ग की प्रतिभाओं को आत्मसात करने का शोषक वर्ग की एक रणनीति है। इस आरक्षण के जरिए वह शोषित पीड़ित वर्ग की उभरती हुई प्रतिभाओं को आत्मसात करके अपनी राजसत्ता को मजबूत कर रहा है। तो पूनापैक्ट पर अम्बेडकर और गांधी में क्या
अन्तरविरोध था..??
दरअसल बात यह थी कि मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग कम्यूनिटी (सम्प्रदाय)मानकर उन्हें 1909 में मार्ले-मिण्टो सुधार के तहत कम्यूनल अवार्ड(साम्प्रदायिक पंचाट) दिया जा चुका था। इसके तहत मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुसलमान ही वोट दे सकता है तथा मुसलमान ही चुनाव लड़ सकता है।
इसके बावजूद भी मुस्लिम लीग के नेताओं को संतुष्टि नहीं मिली। उन्होंने देखा कि इस तरह तो हिन्दू हमेशा बहुसंख्यक ही बने रहेंगे और कांग्रेस उनका नेतृत्व करने के कारण बहुमत में रहेगी।
कांग्रेस का बहुमत कमजोर करने के लिए सबसे पहले मुस्लिम लीग के नेताओं ने अछूतों को हिन्दुओं से अलग कम्यूनिटी मान कर मुसलमानों को मिले कम्युनल अवार्ड की तर्ज पर अछूतों को भी कम्युनल अवार्ड दिया जाये। 1919 में वायसराय कौंसिल में इस आवाज को सर आगा खां ने उठाया था। कांग्रेस अछूतों को हिन्दुओं से अलग कम्यूनिटी मानने के खिलाफ थी। कांग्रेस का मानना था कि अछूत भी हिंदू धर्म के अंग हैं तथा वर्ण-व्यवस्था के अनुसार चौथा वर्ण हैं यानी शूद्र हैं।
1921-22 के दौरान अम्बेडकर ने, जो अब तक विशेष तौर पर महारों का मुद्दा उठाया करते थे, अछूतों को कम्युनल अवार्ड दिए जाने का मुद्दा उठाया। और वेदों, शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों का अध्ययन करके अपनी बातों और लेखनी से यह बताने की कोशिश किया कि अछूत हिन्दू धर्म के अंग नहीं हैं। अछूत हिन्दुओं से अलग एक कम्युनिटी है जब कि गांधी उन्हें हिन्दू धर्म का अंग मान रहे थे। जब गांधी को लगा कि उनकी बात नहीं सुनी जायेगी तो वे तीसरे गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार कर दिए।
तीसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनल्ड ने बीच का रास्ता निकाला। उसने अछूतों अलग कम्यूनिटी मान कर उन्हें पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया और गांधी जी भी नाराज़ न हों इसके लिए अछूतों को एक वोट का अधिकार और दिया गया जिससे वे सामान्य सीटों से सामान्य उम्मीदवार को भी वोट दे सकें।
रैम्जे मैक्डोनल्ड का पत्र जो गांधीजी के नाम था। डाक्टर अम्बेडकर के सम्पूर्ण वांग्मय में छपा है। उसे पढ़िए । दो वोट का अधिकार अम्बेडकर की मांग नहीं थी।
एक वोट अछूतों को हिन्दू कम्यूनिटी से अलग मानते हुए अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार था। दूसरा अछूतों को हिन्दू कम्यूनिटी से जोड़ कर रखने के लिए सामान्य सीट के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार।
गांधी इस पर भी तैयार नहीं थे। वे किसी भी कीमत पर अछूतों को हिन्दुओं से अलग नहीं देखना चाहते थे। अतः दूसरे वोट का अधिकार गाँधी को खुश करने के लिए दिया गया था। मगर गांधी इस पर भी खुश नहीं हुए, वे यरवदा जेल में अनशन पर बैठ गए तब पूना पैक्ट हुआ जिसमें गांधी ने सुरक्षित सीटों की संख्या लगभग दोगुना कर दिया। मगर अछूतों को हिन्दुओं से अलग मानने वाले कम्युनल अवार्ड को वापस करवा दिया।
अम्बेडकर ने कहा था – पूनापैक्ट से अछूतों को सही प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, इससे दलाल और भणुवे पैदा होंगे।
आज इस पूना पैक्ट से मिले आरक्षण के जरिए जो मुठ्ठी भर लोग ऊँचे पदों पर पहुंच गए हैं वही दलाल और भणुवे अम्बेडकरवाद के झण्डाबरदार बने हुए हैं। वे पूनापैक्ट को बुरा मानते हैं और कम्युनल अवार्ड को अछूतों के हित में बताते हैं, मगर आज तक पूनापैक्ट हटाकर कम्युनल अवार्ड लागू करने के लिए कोई आन्दोलन नहीं चलाया। अम्बेडकर के शब्दों में कह रही तो यही “भणवे और दलाल” अम्बेडकर के असली विचारों को छिपा रहे हैं। अम्बेडकरवाद से किसी समस्या का समाधान होगा या नहीं यहां हम इस पर बहस नहीं कर रहे हैं। हमारा कहना है कि ये तथाकथित आम्बेडकरवादी अम्बेडकरवाद के नाम पर आरएसएस के विचारों को दलितों के दिमाग में ठूँस रहे हैं। गुमराह करने के लिए अपने मंच पर पीछे अम्बेडकर का फोटो लगाकर आरएसएस का ज्ञान बांट रहे हैं। यह लेखक के अपने विचार हैं
