ज्ञानरंजन को गुजरे एक हफ्ते हो चुके हैं। उनको लोग अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उनके लेखन और संपादन का विश्लेषण करते हुए असद जैदी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिखा है। जिसे पत्रकार, चिंतक त्रिभुवन ने अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है। उसे यथावत यहां आभार सहित यहां दिया जा रहा है।
ज्ञानरंजन ने हिन्दी साहित्य की दुनिया को कैसे गढ़ा
असद ज़ैदी
गुरुवार (8 जनवरी) को मुझे पता चला कि ज्ञानरंजन (जिन्हें उनके अधिकांश मित्र ‘ज्ञान भाई’ कहते थे) का एक दिन पहले निधन हो गया। वे अपने जीवन के 90वें वर्ष में थे और थकन से चूर थे। पिछले साल नवंबर में हमने जब बातचीत की थी तो अपने स्वास्थ्य को लेकर अचानक उन्होंने कहा था कि वे अपेक्षा से अधिक जी चुके हैं, जितना देखना चाहते थे, देख चुके हैं। “अब मेरी बस यही चाह है कि मेरे दुश्मनों को पता रहे कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।” मैंने जब पूछा कि वे दुश्मन कौन हो सकते हैं तो वे हँस पड़े, “पुराने दोस्त! और कौन?”
कुछ समय से इलाहाबाद और जबलपुर पर एक अजीब-सा सांस्कृतिक कुहासा छाया हुआ है और ज्ञानरंजन के जाने के साथ ही इन शहरों से जुड़ी आधुनिक स्मृतियों का एक बड़ा हिस्सा मानो बुझ-सा गया। अब कोई नहीं बचा, जो उन अनेक गूढ़ और गाढ़े रहस्यों को उजागर कर सके या उन सवालों से जूझ सके, जिन्हें ज्ञानरंजन अधूरा छोड़ गए।
वे हिन्दी लेखकों की ‘साठोत्तरी पीढ़ी’ (1960 के बाद उभरी पीढ़ी) का सबसे पहचाना हुआ चेहरा थे। वह पीढ़ी, यानी जिसने हिन्दी कहानी में नए विषयों, नई संवेदनाओं और नई कथा-शैली का ईजाद किया था। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, महेन्द्र भल्ला और विजय मोहन सिंह ने विद्रोह तीव्र तेवर को और ज़मीनी भावनाओं को साहित्य में स्वर दिया। उनकी भाषा तीखी, धृष्ट, बेपरवाह और आकर्षक रूप से मोहक अभिव्यंजना से भरी थी।
सामाजिक और अंतरंग संबंधों में उभरते तनाव, उपेक्षा, मोहभंग, अकेलापन, युवा पीढ़ी की अस्तित्वगत बेचैनी और कुंठा—ये सब प्रमुख विषय बने। यह सब कुछ उस यथार्थवाद से एक बड़ा विचलन था, जो पहले की पीढ़ियों के गांधीवादी यथार्थवाद और प्रगतिशीलता में दिखाई देता था, साथ ही सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की अमूर्त, वायवीय, कृत्रिम गद्य शैली और निर्मल वर्मा की आत्मकेन्द्रित गीतात्मक दृष्टि से भी अलग था।
यही वह पीढ़ी थी, जो समकालीन जीवन के खोखले और विद्रूप रूपों के विरुद्ध तनकर खड़ी हुई और खड़ी रही भी। इसका सामूहिक साहित्यिक योगदान वामपंथ से जुड़ा हुआ था, परंतु उनमें से अधिकांश राजनीतिक अर्थों में वामपंथी नहीं थे; यह झुकाव उन्हें बाद में मिला। लेकिन उनका प्रभाव अपने समय की सीमाओं, प्रवृत्तियों और साहित्यिक स्कूलों से कहीं आगे तक फैला। वे अपने समकालीनों द्वारा समान रूप से सराहे भी गए और उनसे भयभीत भी।
ज्ञानरंजन की कहानियाँ; जैसे “घंटा”, “पिता”, “बहिर्गमन”, “फेंस के इधर और उधर” दरअसल दूधनाथ सिंह (“रक्तपात”, “रीछ”) और काशीनाथ सिंह (“लोग बिस्तरों पर”), रवींद्र कालिया (“नौ साल छोटी पत्नी”) के साथ मिलकर इस विधा की निर्णायक कृतियाँ मानी जाती हैं। इनमें से अनेक लेखक आगे चलकर उपन्यास और साहित्यालोचना की ओर मुड़े। अगर इस पीढ़ी की किसी एकमात्र कृति को नाम देना हो तो निस्संदेह वह “घंटा” होगी।
“घंटा” में ज्ञानरंजन ने संभवतः स्वतंत्रता-पश्चात हिन्दी कहानी का सबसे स्मरणीय पात्र रचा—कुंदन सरकार। कुंदन सरकार एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी है, संस्कृति का लती, साहित्यिक गोष्ठियों और अपने चारों ओर लेखकों को इकट्ठा करने का शौक़ीन—जिनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें वह भीतर ही भीतर तुच्छ समझता है। उसकी ऊँची सामाजिक हैसियत लेखकों और विद्रोहियों को आकर्षित करती है, जो सामाजिक सीढ़ी में उससे बहुत नीचे हैं।
लेकिन खेल का मैदान सभी के लिए समान नहीं है। चाहे वे असंतुष्ट हों या हाशिए पर धकेले गए लोग। जिस स्थान पर वे इकट्ठा होते हैं, उसका नाम है पेट्रोला। यह गैर-वर्णनात्मक नाम केवल असंतुष्टों की एक प्रेतछाया-सी दुनिया नहीं है, यह शक्ति, विशेषाधिकार और दिखावे से भरी भ्रष्ट व्यवस्था की एक कगार है। इस कथा का कथावाचक, पेट्रोला समूह का सदस्य कुंदन सरकार के इर्द-गिर्द मंडराने, मुफ्त शराब पीने और उस खाई के दूरस्थ इलाकों को देखने के प्रलोभन से खुद को रोक नहीं पाता। कुल मिलाकर वह स्वयं घंटा बन जाता है। यह उसके बढ़ते मोहभंग, विद्रोह और अंततः अपमान की कहानी है। जब वह अपने पतन के बाद पेट्रोला लौटता है तो उसके मित्र हँसकर बात टाल देते हैं और उसे फिर से स्वीकार कर लेते हैं।
कई फ़िल्मकारों को रोमन पोलांस्की की फ़िल्म “चाइनाटाउन” का अंतिम संवाद याद होगा, “फॉर्गेट इट, जैक, इट्ज़ चाइनाटाउन।” लेकिन यह संवाद “घंटा” लिखे जाने के एक दशक बाद आया। साफ़ है कि अनेक मायनों में ज्ञानरंजन अपने समय से आगे थे।
ज्ञानरंजन और उनके मित्रों के साहित्यिक हस्तक्षेप के बाद हिन्दी कहानी पहले जैसी नहीं रही। लगभग एक दशक तक उनकी सघन, निर्भीक और सुगठित गद्य-शैली ने कहानी को हिन्दी साहित्य की अग्रणी विधा बना दिया और कविता को उसके शिखर से नीचे धकेल दिया। लेकिन जब वह दशक समाप्त हुआ, तब थकान के संकेत दिखने लगे। स्वयं ज्ञानरंजन ने सबसे पहले इसे पहचाना। उन्हें लगा कि उनकी लेखन-ऊर्जा घट रही है। न केवल उनकी अपनी सृजनात्मक तीव्रता कम हो रही थी, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल के कारण मध्यवर्गीय अवाँ-गार्द लेखकों का साहित्यिक मंच भी सिमट रहा था, जिससे उनकी दृष्टि की सीमाएँ उजागर हो रही थीं। नक्सल-प्रभावित सांस्कृतिक माहौल के बाद वामपंथी उग्रवाद की अनियंत्रित शक्ति ने कई लेखकों को वामपंथ की ओर मोड़ दिया।
ज्ञानरंजन ने स्वयं को हमेशा अंततः थकान की हद तक काम में झोंक दिया। उन्होंने अपने प्रिय इलाहाबाद को छोड़कर जबलपुर के गवर्नमेंट साइंस कॉलेज में अध्यापन स्वीकार किया। वहीं उन पर पहल जैसी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हिन्दी साहित्यिक पत्रिका को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी आ पड़ी। शुरू में उन्होंने इसे कमला प्रसाद, एक वामपंथी शिक्षक और आलोचक के साथ-साथ सह-संपादित किया और बाद में अकेले ही इसका कमाल संचालन किया।
1970 के दशक के उत्तरार्ध से पाठकों को पहल की प्रतियाँ मिलती रहीं, जिन पर ज्ञानरंजन की विशिष्ट हस्तलिपि में पते लिखे होते थे। इस निजी स्पर्श ने पाठकों और सहयोगियों के साथ लगभग आत्मीय संबंध बना दिया। उनकी गर्मजोशी दिलों को छू लेने वाली थी। यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी, जो उनसे कभी नहीं मिले थे। संपादक के रूप में वे लेखक से कहीं आगे निकल गए थे।
वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे, लेकिन उन्होंने अपनी वामपंथी पहचान को कभी दिखावे का विषय नहीं बनाया। वे कभी पेशेवर पार्टी कार्यकर्ता नहीं बने। वे एक उदार वामपंथी और कुछ हद तक गांधीवादी मार्क्सवादी बने रहे, हालांकि 1960 के बाद के हिन्दी साहित्य की क्रोधाकुल और विद्रोही छवि उनसे जुड़ गई। लगभग तीन पीढ़ियों के लेखक ज्ञानरंजन और पहल के साथ चले।
करीब 35 वर्षों तक पत्रिका निकालने के बाद, वे थकान के दूसरे पड़ाव पर पहुँच गए और 90वाँ अंक निकालने के अगले ही दिन इसे बंद करने का फैसला किया। उन्होंने पाठकों को प्रकाशन पुनः आरंभ करने के लिए मनाने की भरपूर कोशिश की। इसके बाद 35 अंकों की एक और शृंखला चली और फिर पत्रिका बंद हो गई।
यह प्रतिष्ठित लेखक-संपादक-कार्यकर्ता ऐसा कोई व्यक्ति या समूह नहीं ढूँढ पाए जो उनके काम को आगे बढ़ा सके। उन्हें उनकी अडिग धर्मनिरपेक्षता और हिन्दी साहित्यिक प्रतिष्ठान के साथ उनके आजीवन संघर्ष के लिए याद किया जाएगा।
दु:ख की बात है कि पिछले पाँच वर्षों में हिन्दी जगत ने अपने दो महान साहित्यिक संपादक खो दिए—मंगलेश डबराल (2020, कोविड से) और ज्ञानरंजन (2026)। शायद हम फिर कभी ऐसे व्यक्तित्व नहीं देख पाएँगे। (हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिट पेज पर आज छपे लेख का हिन्दी अनुवाद जैसा कुछ)

लेखक – असद ज़ैदी
