कविता
ज़िद है कोई
( लल्नटॉप वाले सौरभ द्विवेदी के लिए )
राजकुमार कुम्भज
ज़िद है कोई
तो है ज़रुरी ये ज़िद भी
कि बची रहे ज़िद.
ज़िद बचाए रखने के लिए
ज़रूरी है कि बचा रहे आदमी
और आदमी का सोच-विचार भी
जिसकी सच में कमी है बेहद
आजकल.
ज़िद और सोच-विचार ही
बनाते हैं आदमी को आदमी
एक अलग आदमी
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