कविता
नन्ही दुनिया
ओमसिंह अशफ़ाक
यह छोटी सी जो बच्ची है
मन की कितनी ये सच्ची है
पापा की प्यारी ‘अक्की’ है
पर यह तो धुन की पक्की है!
लेने की जो ठानेगी
उसको ही लेकर मानेगी-
बाहर भीतर खूब घुमाओ
तरह-तरह के टॉय दिखाओ-
चाबी की मन में ठानेगी
तो टॉफी से ना मानेगी-
चाव से केला खाती है
गुस्से में बहुत इतराती है
फिर नाकों चने चबवाती है
जग सारा इसकी थाती है!
ठुमक-हुमक कर चलती है
गिरती और संभलती है
कमरों में गश्त-सी करती है
चीजों को उठाती-धरती है
जैसे-हाथों से भार को तोलती है
कुछ कहती ना कुछ बोलती है!
बिन बोले ही सर जाता है
घर खुशियों से भर जाता है!
जब मूड में अपने चहकती है
खुशबू आंगन तक महकती है!
कुछ बातें अब तक जान गई है
कुछ अगले वक्तों में जानेगी
शिशु रूप से तरुणाई
फिर मंजिल को पहचानेगी!
अभी जो भी समझती-सुनती है
मन में अपने गुनती है-
जब मन माफिक हो जाता है
चुप झटसे हो जाती है!
जितनी छोटी उतनी प्यारी है
पर आफ़त की भरी पिटारी है!
जब पार्क में बच्चे आते हैं
खेल में उधम मचाते हैं
फिर घर में रुकना दुश्वारी है
मिनटों में बाहर की त्यारी है!
जब ठिन-ठिन कर भौंहें तानेगी
ना मम्मी-पापा की मानेगी?
फिर घर में ही इज़लास लगेगा
सबको भरना दंड पड़ेगा
उंगली को ऐसे तानती है
जैसे अपराध सभी का जानती है?
फिर दादी प्रॉसिक्यूटर बनती है
और जज दादा से ठनती है-
कसूर सभी का बांचूंगी मैं
ना झूठ-मूठ कुछ जांचूंगी मैं
तुम बच्ची को मेरी सताते हो
और झूठे लाड़ लड़ाते हो!
फिर मोक्-ट्रायल होता है
और सजा सभी को मिलती है
सब अपने कान पकड़ते हैं
तब खुशी में गर्दन हिलती है!
करती ऐसे मनमानी है
जैसे सब की वह नानी है!
कोई ओशीन कहे है उसको
कोई कहे तनिष्का
गुड्डू कहकर कोई पुकारे
हो जाती हक्का-बक्का?
आधा दर्जन नाम हैं उसके
है कितना बड़ा झमेला
पर इसी झमेले के भीतर से
दिखता है जग का मेला!..
(13. 5. 2010)
