लोग क्या कहेंगे: एक सवाल, हजार पछतावे

समय समाज

लोग क्या कहेंगे: एक सवाल, हजार पछतावे

डॉ रीटा अरोड़ा

 

कितनी जिंदगियां इस एक सवाल के नीचे दब जाती हैं-आपने कभी सोचा है?

एक युवक हर फैसले से पहले यही सोचता रहा-“लोग क्या कहेंगे?”

नौकरी बदली नहीं, शौक अपनाया नहीं, अपनी पसंद की शादी तक टाल दी।

सालों बाद उसे समझ आया-उसने जिंदगी जी नहीं… बस निभाई।

और विडंबना देखिए-फिर भी लोग खुश नहीं थे।

“लोग क्या कहेंगे”-यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है, यह एक मानसिक कैद है। एक ऐसी कैद, जिसमें हम खुद ही खुद को बंद कर लेते हैं-बिना ताले, बिना दीवारों के। हम अपने फैसले लेते समय यह नहीं सोचते कि हमें क्या चाहिए। हम सोचते हैं-“दूसरों को क्या सही लगेगा?”

नौकरी हो, करियर हो, शादी हो या कोई छोटा सा शौक-हर जगह एक अदृश्य दर्शक बैठा है, जिसे खुश करने की कोशिश हम लगातार करते रहते हैं।

सवाल यह है-क्या वह दर्शक कभी संतुष्ट होता है?

सच्चाई यह है कि “दुनिया” एक नहीं होती। हर व्यक्ति की अपनी राय, अपनी सोच, अपना नजरिया होता है। आप एक को खुश करेंगे, तो दूसरा असहमत होगा। आप सबको खुश करने की कोशिश करेंगे-तो खुद से दूर हो जाएंगे। और यहीं सबसे बड़ी गलती होती है।

शुरुआत में यह “लिहाज” और “संकोच” समझदारी लगता है। लेकिन धीरे-धीरे यही हमारी पहचान को घिसने लगता है। हम अपनी इच्छाओं को दबाते-दबाते इतने सहज हो जाते हैं कि एक समय के बाद हमें खुद ही नहीं पता होता-हम चाहते क्या हैं।

सोचिए-अगर आप अपनी पसंद से कोई फैसला लेते हैं और गलती हो जाती है, तो क्या होता है? आप सीखते हैं, मजबूत होते हैं, आगे बढ़ते हैं।

लेकिन अगर आप दूसरों को खुश करने के लिए फैसला लेते हैं और वह गलत हो जाता है- तो न सीख मिलती है, न संतोष। क्योंकि वह फैसला आपका था ही नहीं।

आज के समय में यह दबाव और बढ़ गया है। सोशल मीडिया ने “लोग क्या कहेंगे” को “पूरी दुनिया क्या कहेगी” बना दिया है। अब तुलना सिर्फ पड़ोसी से नहीं, बल्कि हजारों अनजान लोगों से होती है।

लेकिन सच बहुत सरल है- दुनिया का शोर जितना बढ़ेगा, आपकी अंदर की आवाज उतनी ही दबेगी… अगर आप उसे सुनना बंद कर देंगे।

एक छोटा सा प्रयोग कीजिए-

हर बड़े फैसले से पहले खुद से पूछिए: “अगर कोई देखने वाला न हो, कोई जज करने वाला न हो-तो मैं क्या करता?”

यही आपका सच्चा जवाब है। यही आपकी असली दिशा है। इसका मतलब यह नहीं कि समाज को पूरी तरह नजरअंदाज कर दें। मर्यादाएं जरूरी हैं, मूल्य जरूरी हैं। लेकिन जहां बात आपके जीवन की हो-वहां अंतिम फैसला आपका होना चाहिए।

याद रखिए- जिंदगी का सबसे बड़ा अफसोस गलतियां करना नहीं होता।सबसे बड़ा अफसोस यह होता है कि आपने अपने दिल की बात सुनने की हिम्मत ही नहीं की।

क्योंकि अंत में, आपको अपने फैसलों के साथ जीना है-दुनिया के विचारों के साथ नहीं।

 

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