कर्मचारी आन्दोलन के योद्धा- शूरवीर जयप्रकाश(जेपी)

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-100

कर्मचारी आन्दोलन के योद्धा- शूरवीर जयप्रकाश(जेपी)

सत्यपाल सिवाच

जे.पी. नाम प्रसिद्ध जयप्रकाश बेनीवाल को हरियाणा के कर्मचारी आन्दोलन में एक मजबूत और जांबाज योद्धा की तरह याद किया जाता है। वे किसी भी मुश्किल समय पर चट्टान की तरह अड़ जाने के लिए जाने जाते हैं। भय उनके आसपास भी नहीं फटका। उलझने का क्या नतीजा होगा यह वे कभी न सोचते थे। रोडवेज विभाग के प्रशासन ने उन्हें अनेक बार आरोप पत्र दिए, लेकिन जे.पी. किसी का उत्तर या स्पष्टीकरण नहीं दिया। अधिकारी दबाव डालते तो एक ही जवाब होता – लिख लो अपने आप। मैंने कब कहा था कि मुझे नोटिस दो।

पुराने रोहतक (अब झज्जर) जिले के गाँव मिलकपुर में एक किसान परिवार में जयप्रकाश का जन्म 12 नवंबर 1954 को हुआ। पिता श्री रत्नसिंह आर्मी में थे और माँ चलती देवी घर पर रहकर खेती और पशुपालन का काम देखतीं। वे चार भाई और दो बहन हैं। तीन भाई सेना में रहे और जयप्रकाश ने हरियाणा रोडवेज में नौकरी की। दोनों बहनें अशिक्षित रहीं।

जयप्रकाश आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की और 25 नवंबर 1973 को हरियाणा रोडवेज में डेलीवेजिज पर हेल्पर टेक्निकल नियुक्त हो गए। 10 जनवरी 1975 से उनकी सेवाएं नियमित हो गईं। वे 30 नवंबर 2012 को हेड मैकनिक पद से सेवानिवृत्त हो गए।

वे नौकरी में आने के कुछ वर्ष बाद ही यूनियन मे रुचि लेने लगे थे। उन दिनों रोडवेज में इंटक की यूनियन थी। उनके कजिन ने डिपो में सेक्रेटरी पद का चुनाव लड़ा और हार गए। जे पी को लगा कि नेता बनना है तो आम कर्मचारी से गहरा और सक्रिय तालमेल बनाना चाहिए। जब 1979 में रोडवेज की हड़ताल हुई तो जयप्रकाश इसमें कूद गए। वे इस दौरान गिरफ्तार कर लिए गए और महीने भर बाद रिहा हुए।

वे चण्डीगढ़ स्थित केन्द्रीय कर्मशाला में हरियाणा रोडवेज वर्करज यूनियन के प्रधान रहे। रोहतक में डिपो के प्रधान रहे। बाद में संगठन के अध्यक्ष, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, चीफ आर्गेनाइजर आदि पदों पर निर्वाचित होकर मुख्य नेतृत्व का हिस्सा रहे। इसके अलावा वे सर्वकर्मचारी संघ के खण्ड प्रधान तथा जिला व राज्य कार्यकारिणी सदस्य रहे। रिटायरमेंट के बाद वे अखिल भारतीय किसान सभा के साथ काम करने लगे तथा झज्जर जिले के अध्यक्ष बने। ऐतिहासिक किसान आन्दोलन में उन्होंने ढांसा बार्डर पर मोर्चा चलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। वे अपने घरेलू उत्तरदायित्व की परवाह किए बिना साथियों के घर जाकर संपर्क करते, जिससे संगठन को बल मिला। अब कुछ सालों से अस्वस्थ होने के कारण बाहर नहीं निकल पाते हैं।

जयप्रकाश स्वभाव से निडर और बुलंद हौसले वाले साथी हैं। इसलिए जहाँ कहीं भी लाठीचार्ज, पुलिस दमन अथवा सीधे टक्कर लेने की बात होती है वहाँ वे अगली लाइन में होते। वे हकीकत में जांबाज हैं। रोडवेज में शासन से भिड़ने की स्थिति तो बनती ही रही हैं। उनके चलते जयप्रकाश बहुत पुलिस दमन का शिकार हुए, लेकिन उन्हें पीछे हटना नहीं गवारा नहीं हुआ। वे सन् 1979 में एक महीना, 1989 में  उन्हें भिवानी में गिरफ्तार किया गया। 7 मार्च 1991 के चण्डीगढ़ लाठीचार्ज में चार दिन, 1993 में आठ दिन तथा 1996-97 में 57 दिन जेल में रहे। अनेक बार वे पुलिस हिरासत में रहे। उन्हें 1979 और 1993 में सेवा से बर्खास्त किया गया। वे बहुत बार निलंबित किए गए; 7-8 बार स्थानांतरण हुए। दूसरी यूनियन के साथ टकराव में उन पर 12 बार हमले हुए। चार्जशीट को वे गुलामी का दस्तावेज कहा करते तथा कभी चार्जशीट का जवाब नहीं दिया। संगठन के दबाव में ये मामले निरस्त किए गए। एक बार उनकी दो इंक्रिमेंट बंद की गई थी जो समझौते के साथ बहाल कर दी गई।

जयप्रकाश को लगता है कि सर्वकर्मचारी संघ ने कर्मचारियों को न्याय के लिए लड़ना सिखा दिया। वे सन् 1986 के आन्दोलन के समय इंटक को छोड़कर संघर्ष में आने वालों में शामिल हुए। संघर्ष में व्यक्ति की परख होती है। सर्वकर्मचारी संघ से जुड़ने के बाद रोडवेज वर्करज में नया उत्साह आया। जे.पी. ने कभी किसी राजनीतिक नेता अथवा आला अफसरों के साथ सम्बन्ध नहीं बनाए। इसलिए कोई निजी हित पूरा करने का सवाल ही पैदा नहीं हुआ। आत्मालोचना करने में वे काफी उदार हैं। फतेहाबाद सम्मेलन में पद से नाम वापस उचित नहीं था। एक बार सर्वकर्मचारी संघ के प्रधान से इस्तीफा देकर भी गलती की थी। एक मौका ऐसा भी आया जब दूसरी यूनियन के आह्वान पर हड़ताल में शामिल हो गए। वे संगठन में रहते हुए अपनी भूल स्वीकार करने में नहीं झिझकते थे।

पहले से तुलना करते हुए वे कहते हैं कि हालात बदल गए हैं; आस्था घट रही है और अब

संघर्ष पर भरोसा कम हो रहा है।

सांगठनिक शिक्षा की कमी है

ज्वाइंट मोर्चा तो उचित है लेकिन स्वतंत्र गतिविधियों के बिना संगठन नहीं चल सकता। कार्यकर्ताओं समर्पणभाव की  कमी से भी वे चिंतित हैं। उन्हें संघर्षों में परिवार से सहयोग मिला है। हाँ, घर न जाने से जरूर दिक्कत होती थी। सन् 1975 में उनका विवाह श्रीमती पतासो के साथ हुआ। उनकी एक बेटा और चार बेटियां हैं। दो बेटियां आठवीं तक पढ़ीं, एक प्लस टू तथा एक अनपढ़ है। सभी विवाहित हैं और अपना घर संभालती हैं। बेटा बीसीए, एमबीए और एम ए पढ़ा है। खेलों के क्षेत्र में काम है। उनकी पोती मुस्कान बेनीवाल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की बाक्सिंग खिलाड़ी है और रेलवे में नौकरी करती है। एक पोती एमबीए है। वह भी राष्ट्रीय स्तर तक खेली है। पोता सागर प्लस टू में है और उसकी भी खेलों में रुचि है। पुत्रवधू जॉब छोड़कर अपनी दुकान चलाती है। फिलहाल परिवार रोहतक शहर में आबाद है।(सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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