छात्रों के भविष्य के साथ आँख मिचौली का खेल खेलती यूजीसी नेट

छात्रों के भविष्य के साथ आँख मिचौली का खेल खेलती यूजीसी नेट

उच्च शिक्षा के ‘राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा’ में न विषय केंद्रित प्रश्न न शिक्षण कौशल पर ट्रेनिंग

अंकित कात्यायन

जॉन डेवी ने कहा था कि “शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं है, शिक्षा स्वयं जीवन है।” इसी विचार के आलोक में यदि राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा ‘यूजीसी नेट’ को देखा जाए, तो इसके उद्देश्य और संचालन पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। ‘यूजीसी नेट’ 2025 के दिसंबर चरण की परीक्षा 31 दिसंबर से 8 जनवरी के बीच संपन्न हुई। यह परीक्षा देश में पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश तथा उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्यापन के लिए पात्रता निर्धारित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा यह परीक्षा वर्ष में दो बार आयोजित की जाती है, जिसमें 85 विभिन्न विषयों की कंप्यूटर आधारित परीक्षा ली जाती है।

हालांकि, बीते कुछ वर्षों में इस परीक्षा के संचालन और व्यवस्था को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं, लेकिन न तो इन मुद्दों पर प्रमाणिक रूप से व्यापक चर्चा हो पाती है । परिणामस्वरूप, यह परीक्षा निरंतर असंतोष और अविश्वास के दायरे में आती जा रही है।

नेट के परीक्षा के सवाल एक अनसुलझी पहेली

2 पेपर, 20 चैप्टर, 150 प्रश्नों वाली इस परीक्षा की तैयारी में अभ्यर्थी वर्षों की मेहनत और निरंतर अध्ययन लगाते हैं, लेकिन परीक्षा के दिन जब कुछ प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर या अस्पष्ट प्रतीत होते हैं, तो धैर्य बनाए रखना और शिक्षा प्रणाली पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। विडंबना यह है कि नेट के पाठ्यक्रम की पहली ही इकाई में विद्यार्थियों को रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह विचार पढ़ाया जाता है कि “शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि सोचने और प्रश्न करने की क्षमता विकसित करना है।” इसके विपरीत, स्वयं इसी परीक्षा में बड़ी संख्या में ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जो केवल स्मृति आधारित होते हैं। शिक्षा की प्रक्रिया में बदलने की इस प्रवृत्ति पर पाउलो फ्रेरे ने चेतावनी दी थी “जब शिक्षा केवल उत्तर याद रखने की प्रक्रिया बन जाती है, तब वह उत्पीड़न का साधन बन जाती है।” ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या ‘यूजीसी नेट’ जैसी परीक्षा भी आज विद्यार्थियों के लिए ज्ञान के मूल्यांकन की बजाय मानसिक और अकादमिक दबाव का माध्यम बनती जा रही है?

पेपर लीक घोटाला

वर्ष 2024 में आयोजित ‘यूजीसी नेट’ परीक्षा के दौरान जैसे ही पेपर लीक की आशंका सामने आई, शिक्षा मंत्रालय द्वारा परीक्षा को तत्काल रद्द कर दिया गया। यह निर्णय प्रणाली की संवेदनशीलता को दर्शाता है, लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए। जनवरी 2025 में सेंट्रल ब्युरो इन्वेस्टगैशन ने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि जाँच के दौरान पेपर लीक के ठोस साक्ष्य नहीं मिले। जिसकी वजह से किसी पर भी कोई कारवाही नहीं की जा सकी।

इस पूरे घटनाक्रम ने उन लाखों विद्यार्थियों की वर्षों की अकादमिक प्रतिबद्धता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि परीक्षा रद्द करने से लेकर जाँच निष्कर्षों तक की पूरी प्रक्रिया पर सार्वजनिक और अकादमिक स्तर पर गंभीर विमर्श हो, ताकि भविष्य में इस प्रकार की स्थितियों से बचा जा सके और प्रणाली पर भरोसा कायम रहे।

शिक्षण कौशल ट्रेनिंग

शिक्षण के लिए ली जाने वाली योग्यता परीक्षाओं में पढ़ाने की कला शैली पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। ‘यूजीसी नेट’ पास करने के बाद छात्र सहायक प्रोफेसर और शोध के लिए योग्य माने जाते हैं और तभी उन्हें कॉलेज व विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का अधिकार मिलता है। लेकिन इस प्रक्रिया में यह मान लिया जाता है कि विषय का ज्ञान ही अच्छा शिक्षक बनने के लिए पर्याप्त है, जबकि पढ़ाने की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं दी जाती।

भारत में प्राथमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए ‘बीएड’ अनिवार्य है, लेकिन विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए केवल ‘यूजीसी नेट’ परीक्षा को ही पर्याप्त माना जाता है। इस परीक्षा में टीचिंग एप्टीट्यूड से बस दो- चार प्रश्न होते हैं। परीक्षा पास करने के बाद शिक्षण प्रशिक्षण की कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं है, जो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डालती है।

नो नेगेटिव मार्किंग – तुक्का या तर्क?

भारत में कई योग्यता परीक्षाओं में नेगेटिव मार्किंग नहीं होती, जिसके कारण परीक्षा में अनुमान से उत्तर देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जब ग़लत उत्तर पर कोई नुक्सान नहीं होता, तो यह स्पष्ट नहीं रह जाता कि चयन ज्ञान और समझ के आधार पर हो रहा है, या केवल किस्मत के सहारे। दूसरी ओर, 12वीं पास छात्रों के लिए होने वाली जेईई मेन और नीट जैसी परीक्षाओं में नेगेटिव मार्किंग लागू है, जिससे गंभीर तैयारी करने वाले छात्र आगे बढ़ते हैं। ऐसे में यूजीसी नेट जैसी उच्च स्तरीय परीक्षा में इसका अभाव असंतुलन पैदा करता है। यदि इसमें भी नेगेटिव मार्किंग हो, तो योग्य अभ्यर्थियों का चयन अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है और तुक्केबाज़ी की संभावना कम होगी।

नए प्रारूप की ज़रूरत

नेट परीक्षा वर्ष 1989 से आयोजित की जा रही है, लेकिन नई शिक्षा नीति (NEP) में भी पीएचडी और इस परीक्षा से जुड़े किसी बड़े बदलाव का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। ऐसे में अब ज़रुरत है कि एक नई समिति बनाई जाए, जो इन मुद्दों पर गहराई से अध्ययन करे और वर्तमान ज़रुरतों के अनुसार एक बेहतर और नया परीक्षा ढांचा तैयार करे। क्योंकि इस परीक्षा प्रणाली पर देश की उच्च शिक्षा की नींव टिकी हुई है।

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