मंजुल भारद्वाज की दो कविताएं
1
विडंबना!
महाराष्ट्र में वारेकरी
गणपति उत्सव
उड़ीसा में पुरी पर्व
बंगाल का दुर्गा उत्सव
दशहरा और देश के अन्य राज्यों में
भिन्न भिन्न उत्सवों में
करोड़ों देशवासी सहभागी हो
आस्था का जश्न मनाते हैं!
उसी आस्था का जश्न मनाते हैं
जहां डर है
ईश्वर है
वर्णवाद है
शोषण है
सदियों से सदियों तक चलती
शोषणकारी व्यवस्था है !
यही करोड़ों देशवासी
अपने लिए एक न्याय संगत
समतावादी व्यवस्था का निर्माण
नहीं करते क्यों?
2
शिक्षा
ऊंचा सरकारी पद
धन या गरीबी
आपको आस्था के अंधकार से
मुक्त नहीं करती
अपितु आपके तर्क को कुतर्क में बदल
आस्था की पैरवी कराती है
क्योंकि परंपरा,संस्कार और संस्कृति के लिहाफ़
जन्मजात आपको आस्था में लपेटे रहते हैं
लेखक,कवि,साहित्यकार,संस्कृति कर्मी
कलाकार आस्था के अंधप्रचारक होते हैं!
सरस्वती साक्षात गले में उतर आती है
सरस्वती कलम में उतर आती है के उद्घोष
कलाकारों और कला प्रेमियों के तकिया कलाम हैं
घोर अनिश्चितता
कलाकारों को पूंजीवाद की कठपुतली बनाकर
सारी ज़िंदगी नचाती है
साहित्यकार सत्ता के गुणगान
या किसी वाद के प्रचारक हो
सिद्धहस्त होते हैं
कई और शिगूٖफ़े होते हैं
रचना या कलाम के व्याकरण का
लोकप्रियता का
वाहवाही का
यह सब एक गिरोह की तरह
सक्रिय रहते हैं
आस्था पर प्रहार को
नज़र अंदाज़ करते हैं
घाघ इतने की सामने खड़े सत्य को नकार
झूठ को सत्य बताते हैं!
दरअसल आस्था को वही छोड़ पाता है
आस्था की अंधी गुफ़ा से वही बाहर आता है
जो प्रकृति को समझता है
इंसान हो
न्याय,समता,सत्य का पैरोकार होता है
मनुष्य हो
मनुष्य को व्यवस्था का ज़िम्मेदार मानता है!
डर आपको सत्य नहीं
झूठ की ओर ले जाता है
डर आपके आत्मबल को मार देता है
डर आपको आत्महीन बनाता है
आत्महीनता आपको विकारों से भर देती है
डर तानाशाह पैदा करता है
इतिहास साक्षी है
हर तानाशाह डरा हुआ होता है।
डरो मत निडर बनो
निडरता आपको सत्य के मार्ग पर
चलने के प्रेरित करती है
निडरता आपमें आत्मबल जगाती है
आत्मबल आपको समग्र विचारों से भर देते हैं !
समग्र विचार विवेक की लौ जगा
इंसानियत का पैरोकार बनाते हैं
संवेदना, सह अनुभूति ,अहसास
सौहार्द,शांति और सहिष्णुता से
आपके व्यक्तित्व को निखारतें हैं !
डर से जो शोषण स्वीकारता है
वो इंसान होने की मूल
योग्यता खो देता है!
डर से जो शोषक का साथ देता है
वो शोषक से ज्यादा
मनुष्यघाती होता है!
डर मत पालो
डरने की बजाए
आप चैतन्यशील बनो
चेतना जगाओ अपने अंदर
सृजन,सम्मान,प्यार
न्याय,समता और इंसानियत की !
