मंजुल भारद्वाज की दो कविताएं
1
कब इंसान बनेगी?
क्या फ़र्क है
पल्लू, घूंघट,नक़ाब या हिज़ाब पहनी
इन देहों में?
दुनिया को जन्म देने वाली
मर्दों की दुनिया में
संस्कार,संस्कृति के नाम शोषित
सीता,सिमरन,सूजी और सलमा में?
कोख,गर्भ कुदरत की
सृजन नियामत है
पर कुदरत की नियामत को
अनंतकाल तक शोषण का अभिशाप
मानने वाली,बनाने वाली
कब जागेगी ?
मां,बहन,बेटी,
बीवी बनाई जाने वाली
कब इंसान बनेगी ?
ये सूरत उन्हीं को बदलनी है
जो इस सूरत में हैं
तू खुद को बदल
तू खुद को बदल
तभी नज़र और नज़रिया बदलेगा !
पर सवाल है
सदियों से दुनिया भर में
धर्म,सामंतवाद,
पितृसत्ता और पूंजीवाद की गुलाम
आधी आबादी
कब अपने हकों के लिए
आर पार का संघर्ष करेगी
भारत के संविधन की शान बनेगी !
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2
कुत्ते का रोना और सपने का टूटना !
कल भारत के गाँव देहात में
कुत्ते के रोने की चर्चा थी
कुत्ता कल भरी पंचायत में
बहुत फफक कर रोया था
सारा देहात अनहोनी
आशंका से भर गया
गाँव -देहात में कुत्ते के रोने को
अशुभ माना जाता है
लोगों की आशंका सही साबित हुई
आज कुत्ता अपने मालिकों के लिए खूब भौंका
उसने समर्पण भाव से
हर किसी को काट खाया
पर अपने पूंजीपति मालिक के
गले में बंधे पट्टे का नाम खूब चमकाया
कुता अपनी ज़बान में बोला
पर इंसानी जुबान में उसका मतलब है
देश को पूंजीपतियों के नाम लिखना ही
मेरी स्वामी भक्ति है
स्वामी ही मेरी शक्ति है
मैं गरीबों को देशद्रोही मानता हूँ
अमीरों को देशभक्त
मैं देश भक्त पूंजीपतियों का पालतू हूँ
और कुत्ता भोंकता रहा
आगे क्या हुआ पता नहीं
नींद बीच में टूट गई
सपना अधूरा छूट गया !

कवि- मंजुल भारद्वाज
