नफ़रत के दौर पर जयपाल की दो कविताएं

नफ़रत के दौर पर जयपाल की दो कविताएं

1

पहचान

 

तुम्हारे वस्त्रों से ही तय होगी अब तुम्हारी पहचान

सही सुना तुमने

अब तुम्हारे वस्त्र ही तय करेंगे तुम्हारा चरित्र

जिस तरह तुम्हारे मोहल्ले ,बस्ती या पूजा करने के स्थान से

तय हो रही है तुम्हारी औकात

तुम्हारी खाने-पीने की चीजों से तय हो रहा है

तुम्हारा सभ्य या असभ्य होना

धार्मिक या अधार्मिक होना

आस्तिक या नास्तिक होना

देशप्रेमी या देश द्रोही होना

उसी तरह

अब तुम्हारे काम से नहीं तुम्हारे नाम से तय होगी देश में तुम्हारी जगह

तुम  कितने सहमत हो और कितने असहमत

यह तय करेगा

तुम कितने बचोगे या कितने मार दिए जाओगे

भय बिन होई न प्रीति

मतलब तुम्हें डर कर रहना है और प्यार करना है

तुम्हारा इस  तरह रहना तय करेगा

कि तुम्हें रहना है या नहीं रहना है

2.

रंगरेज

 

किसने तुम्हारे चेहरों को पोत दिया है

और कपड़े रंग दिए हैं

देखिए…

हम सबके कपडों का रंग

एक जैसा होता जा रहा है

और चेहरों का भी

चेहरे तमतमा रहे हैं

और कपड़े भी

 

दरवाजे पर किसी पार्टी का पोस्टर टंगा है

घर है या पार्टी का दफ्तर

छत पर विजय पताका

गेट पर हथियारों की प्रदर्शनी

वाहन पर नंबर की जगह

जाति, गौत्र और धर्म

कौन घूम रहा है शहर में

गौर कीजिए

 

देखिए….

घृणा और क्रोध से चिंघाडते

बदले की भावना से भरे हुए

लाल-सुर्ख खूनी-आंखों वाले

ये किस लोक के देवी देवता हैं

आतंकी,नर-संहारी…..

 

और देखिए यह भी….

कि किसने पोत दिया है हमारे शहर को

खूनी रंग में