राजकुमार कुम्भज की वसंत पर तीन कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की वसंत पर तीन कविताऍ.

1

वसंत नहीं सच दूसरा

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सच है आग-पानी-हवा

पृथ्वी और आकाश की ही तरह

सच है जीवन-मृत्यु भी सच-सच

इनका होना ही है सबूत मेरा होना

मेरे होने का सबूत सिर्फ़ हूॅं मैं ही

नहीं कुछ और,नहीं कहीं कुछ और

दूसरा-तीसरा भी होता नहीं कोई

सिर्फ़ एक अकेला विकल्पहीन

वसंत भी होता है एक अकेला ही

वसंत नहीं सच दूसरा.

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2

एकांत की पुकार है वसंत

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जहाँ-जहाँ लिखना चाहता हूँ प्रेम

वहाँ- वहाँ लिखता चला जाता हूँ वसंत

पहले वसंत लिखता है मुझे,फिर मैं

वह जगाता है मुझे,जागता हूँ मैं

सुलगने से पहले की आहट हैं कुछेक

और हैं कुछेक वे मद्धम ध्वनियाँ भी

जिनमें इसी पृथ्वी,इसी पृष्ठभूमि के सुख-दु;ख भी शामिल तमाम-तमाम

कई-कई बंदिशों के बाद भी आवरणहीन

अनेकांत के एकांत की पुकार है वसंत

जैसे रोशनियाँ अनेकानेक.

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3

कितने दिन कितने वसंत और?

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मुक्त है और मुक्त करता है सब

घटता है ठीक-ठीक घटनाओं की तरह

घटाता नहीं है कहीं कुछ भी ज़रा नहीं

पता भी किसी से कुछ पूछता नहीं

देता है मार्ग और दर्शन सभी-सभी को

मगर करे तो करे ही क्या उन लोगों का

जिनके शैतानी दिमाग़ों में शैतानियाँ ढेरों

और घर शरीफ़ों के ख़ाली नहीं

शराफ़त की लगातार रेंग रही चींटियों से

सब देखते हैं और देखता हूँ मैं भी

बहुत कुछ,बहुत कुछ पूछते हुए यहीं कहीं

कितनी तारीख़ें,कितने दिन वसंत और

जब अपने हों,सपने हों सच सब?

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