बर्तोल्त ब्रेख्त की तीन कविताएं

अभी पिछले दिनों (10 फरवरी) को विश्व सर्वहारा के अग्रणी कवि, नाटककार और रंगकर्मी बर्तोल्त ब्रेख़्त के जन्म-दिवस था। यहां प्रस्तुत है उनकी अन्धेरे समय की तीन कविताएं :

बर्तोल्त ब्रेख्त की तीन कविताएं

(1)

 भावी पीढ़ियों के नाम

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सचमुच कितना अन्धेरा समय है

जिसमें जी रहा हूं मैं!

निष्कपटता अब एक अर्थहीन शब्द भर है।

एक सौम्य माथा परिचायक है

हृदय की कठोरता का।

वह जो हंस पा रहा है

तय है कि उसने नहीं सुनी हैं अब भी

दिल दहला देने वाली ख़बरें।

आह, यह कैसा समय है

जब पेड़ों के बारे में बतियाना भी

प्राय: एक जुर्म है

जबकि यह अन्याय के ख़िलाफ़ चुप रहने से कम नहीं।

और वह जो निकल पड़ता है

टहलने चुपचाप सड़क पर,

क्या वह चला नहीं गया है

अपने दोस्तों की पहुंच से बाहर?

मुसीबत जबकि ऐन सिर पर है?

यह सच है : मैं जीवित हूं अब भी

पर, मेरा यक़ीन करो,

यह सिर्फ़ एक दुर्घटना है।

कुछ भी कहां रह गया है, जो कर सके

भरण-पोषण के लिये मेरे दावे को सही?

यह एक संयोग भर है कि मैं बच गया

(यदि भाग्य छोड़ जाता मेरा साथ,

तो नहीं होता मैं।)

उन्होंने मुझसे कहा : खाओ और पीयो।

ख़ुश रहो कि तुम ऐसा कर सकते हो!

पर किस तरह मैं खा-पी सकता हूं

जब भूखों से छीना गया निवाला मेरा भोजन है

और मेरे गिलास में किसी प्यासे का पानी है?

और तब भी मैं खाता और पीता हूं।

मैं ख़ुशी-ख़ुशी बुद्धिमान हो गया होता।

प्राचीन पुस्तकों ने हमें बताया है

कि बुद्धिमानी है क्या :

दुनिया के खटराग से बचो

अपने थोड़े-से समय को भरपूर जीयो

डरो मत कभी किसी से

हिंसा कभी मत करो

बुराई के बदले अच्छाई करो,

इच्छाओं की पूर्ति नहीं बल्कि विस्मृति करो

ज्ञान के रास्ते खोजो।

मैं इनमें से कुछ भी न कर सका :

फिर भी जी रहा हूं मैं इस अन्धेरे समय में।

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मैं शहरों में आ गया उपद्रव के दौर में

जब भूख ही भूख पसरी थी हर ओर।

मैं लोगों के बीच आया,

जब दौर विप्लव का था

और मैंने विद्रोह किया उनके साथ मिल कर।

सारा समय इसी में बीत गया

जितना भी मिला था इस पृथ्वी पर मुझे।

मैंने अपना भोजन अक्सर

मार-काट के बीच ही ग्रहण किया।

मौत की परछाइयां पड़ती ही रहीं मेरी नीन्द पर।

और जब मैंने प्यार किया,

पूरी तटस्थता से प्यार किया।

जब भी देखा प्रकृति की ओर,

पूरी अधीरता से देखा।

सारा समय इसी तरह बीत गया

जितना भी मिल पाया था इस पृथ्वी पर मुझे।

मेरे समय में सड़कें

दलदल की ओर ले जाती थीं।

भाषणों ने मुझे हत्यारे की निग़ाह में ला दिया था।

मैं जो कुछ भी कर सकता था,

वह एकदम नाकाफ़ी था।

पर मेरे बग़ैर शासक रह सकता था

कहीं अधिक निरापद।

ऐसी थी मेरी आशावादिता।

इस तरह वह समय बीत गया था

जितना मिला था इस पृथ्वी पर मुझे।

तुम, जो इस बाढ़ से उबरोगे,

जिसमें कि हम डूब रहे हैं,

सोचना,

जब भी बात करना हमारी कमज़ोरियों के बारे में

इस अन्धेरे समय के बारे में भी सोचना,

जिनकी वजह से उभर आयीं वे।

अपने जूतों से ज़्यादा देश बदलते आये हम

वर्ग-संग्राम में, नाउम्मीद

जब हर तरफ़ केवल अन्याय ही था

और प्रतिरोध नहीं था।

हमें केवल इतना ही मालूम था कि :

सड़ांध के प्रति घृणा भी

माथे की कठोरता बढ़ा देती है।

अन्याय के प्रति आक्रोश भी

बढ़ा देता है आवाज़ में कटुता।

आह, हम

जिन्होंने ख़्वाब देखा था

नेकी की बुनियाद रखने का,

अपने आपको भी नहीं बना सके नेक।

पर तुम, जब आख़िरकार

यह समय आ ही जाये तो याद रखना

कि आदमी अपने साथी की मदद

कर ही सकता है,

हमारे बारे में फ़ैसला करते हुए

बहुत अधिक सख़्ती मत बरतना।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद– राजेश चन्द्र, 22 मई, 2018)

 

 

 

(2)

आलोचनात्मक अभिवृत्ति के प्रति

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आलोचनात्मक अभिवृत्ति

बहुत से लोगों को नागवार गुज़रती है

ऐसा इसलिये क्योंकि उन्हें लगता है

राज्यसत्ता आलोचना की परवाह ही नहीं करती

हालांकि ऐसे मामलों में ख़ास बात यह है कि

बेकार आलोचना आम तौर पर

महज एक अशक्त अभिवृत्ति हुआ करती है।

आलोचना को हथियार दें

और देखें कि किस प्रकार यह

राज्यसत्ता का ध्वंस भी कर सकती है।

किसी नदी से नहर निकालना

किसी फलदायी वृक्ष का कलम बांधना

किसी व्यक्ति का शिक्षण करना

किसी राज्यसत्ता को बदल देना

ये सभी सार्थक आलोचना के ही दृष्टान्त हैं

वैसे ही जैसे किसी सार्थक कला के।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 5 अप्रैल 2018)

 

 

(3)

अरक्षितों का गीत

 

– (‘द गुड वूमैन ऑफ़ सेट्ज़ुआन‘ नाटक से)

हमारे मुल्क़ में

एक क़ाबिल आदमी

मुहताज़ होता है क़िस्मत का

जब तक मिल न जाये उसे

कोई मज़बूत सरपरस्त

मुश्क़िल ही है कि साबित कर पाये वह

क़ाबिलियत ख़ुद की।

किसी भले आदमी के लिये बचा पाना ख़ुद को

नामुमकिन ही है

और तो और ईश्वर ख़ुद भी

निस्सहाय ही रहते हैं यहां।

आह, आखि़र क्यों नहीं हैं ईश्वर के पास

आत्मरक्षा के ख़ुद के साज़ो-सामान

और हैं तो क्यों नहीं तैनात करते उन्हें वे

बुराई के खि़लाफ़ अपनी मुहिम में

अच्छाई की ताज़पोशी और

दंगों की रोकथाम के लिये

और इस दुनिया में अमन के हालात लाने के लिये?

आह, आखि़र क्यों नहीं करते ईश्वर

काम ख़रीद और बिक्री के

क्यों रोक नहीं लगाते नाइन्साफ़ी पर

क्यों नाश नहीं कर देते वे भुखमरी का

क्यों नहीं दे देते रोटी हरेक शहर को

और खुशहाली हरेक घर के लिये?

आह, आखि़र क्यों नहीं करते ईश्वर

काम ख़रीद और बिक्री के?

(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 5 नवम्बर, 2018)

राजेश चंद्रा के फेसबुक वॉल से साभार

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