परिभाषा की संकीर्ण गली में न्याय की “शोभायात्रा
त्रिभुवन
कभी-कभी देश की सबसे बड़ी अदालत किसी क़ानून को “रद्द” नहीं करती; बस उसे कुछ देर के लिए कुर्सी पर बिठा देती है; जैसे उसी क़ानून से कह रही हो: पहले ठीक से बोलो, फिर लागू होना। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक यही किया; यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2026 को “अबेयन्स” में रखते हुए कहा कि ये “वेग” और “कैपेबल ऑफ मिसयूज़” हैं और इनके प्रभाव “स्वीपिंग” हो सकते हैं; साथ ही अंतरिम रूप से 2012 के नियमों को ही जारी रखने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा; भाषा “वेग” है, “कैपेबल ऑफ मिसयूज़” है, “स्वीपिंग” है। पर असली प्रश्न किसी एक आदेश का नहीं; प्रश्न उस परिभाषा का है, जो न्याय का द्वार बनती भी है और चौकीदार भी; किसे भीतर आने दे, किसे बाहर रोक दे।
रेगुलेशन 3(1)(सी) में “कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन” को केवल एससी-एसटी-ओबीसी के विरुद्ध भेदभाव तक सीमित कर दिया गया। कागज़ पर यह एक वाक्य है; सामाजिक जीवन में यह एक सीमा-रेखा है और सीमा-रेखाएँ अक्सर निर्दोष नहीं होतीं; वे सत्ता का नक्शा होती हैं। क़ानून की तटस्थता कई बार एक सबसे परिष्कृत छल होता है। वह कहती है “मैं सबके लिए हूँ”, लेकिन परिभाषा के भीतर ही कुछ लोगों को अदृश्य कर देती है या कुछ अपराधों को “अपराध” कहने के योग्य ही नहीं रहने देती। और जब किसी पीड़ित को परिभाषा में ही जगह न मिले, तो न्यायालय में उसका प्रवेश “अधिकार” नहीं, “मिन्नत” बन जाता है।
लॉजिकली देखें तो यहाँ भावुकता नहीं, संरचना के भीतर झांकने की ज़रूरत रहती है। जाति कोई निजी दुर्भावना भर नहीं; वह एक सिस्टम है। नियमों, परंपराओं, संस्थानों और रोज़मर्रा की भाषा में धंसी हुई। इसीलिए “डिस्क्रिमिनेशन” का सवाल भी केवल “कौन” का नहीं, “कैसे” का है। यदि आपकी परिभाषा जाति-आधारित भेदभाव को एक-दिशा में मानकर चलती है तो आप समाज का मनोविज्ञान नहीं; उसका पावर-आर्किटेक्चर पढ़ रहे हैं; और वह आर्किटेक्चर ऐतिहासिक रूप से असमान है। यही कारण है कि समानता का अर्थ समता का सामाजिक आधार है, न कि सिर्फ़ एक ही तरह की पंक्ति में सबको खड़ा कर देना। संविधान का अनुच्छेद 14 भी “बराबरी” को “अंधी समानता” नहीं बनाता; वह मनमानी के विरुद्ध एक तर्क है और मनमानी अक्सर परिभाषा की छोटी-सी दरार से भीतर आती है।
तो रास्ता क्या है? न तो “कास्ट-न्यूट्रल” धुलाई; जो इतिहास के दाग़ को काग़ज़ की स्याही से धो देने का भ्रम पैदा करती है और न ही ऐसी संकीर्ण परिभाषा जो न्याय को पहचान-पत्र की तरह बना दे। अंबेडकर का उपाय प्रक्रियागत न्याय है: शिकायत का दरवाज़ा हर स्टेकहोल्डर के लिए खुला रहे, पर सुरक्षा के सेफ़गार्ड्स यानी मॉनिटरिंग, एंटी-रिटैलिएशन, दंड और जवाबदेही आदि उन समूहों के लिए अधिक कठोर हों, जिनके विरुद्ध संस्थागत बहिष्कार का इतिहास और वर्तमान दोनों भारी हैं। यानी यूनिवर्सल एक्सेस, टार्गेटेड प्रोटेक्शन; क्योंकि समान गरिमा तक पहुँचना एक ही सीढ़ी से सबके लिए संभव नहीं होता।
अपरवर्ग की असली असहजता यहाँ उजागर होती है। वे नहीं चाहते कि परिभाषा इतनी सक्षम हो जाए कि पीड़ित “सिर्फ़ रोए” नहीं; कानूनी तौर पर दर्ज भी हो जाए। पर संविधान की नैतिकता यही कहती है कि लोकतंत्र में सबसे पहले क़ानून को ताकतवर की सुविधा नहीं, कमज़ोर की ढाल बनना चाहिए। और ढाल का पहला काम परिभाषा के भीतर पीड़ा को नाम देना है, ताकि न्याय शोभायात्रा न रहे; न्याय कार्यवाही बन सके। त्रिभुवन के फेसबुक वॉल से साभार
