कीमत तो चुकानी ही होगी : मोहनदास नैमिशराय
अंबाला में अपने लेखक से मिलिए कार्यक्रम में मोहनदास नैमिशराय ने सवालों के दिए जवाब

अंबाला शहर में जलेस और प्रलेस के साँझा प्रयास से आज जलेस के प्रदेश-अध्यक्ष जयपाल के निवास पर ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में देश के प्रख्यात लेखक श्री मोहनदास नैमिशराय (दिल्ली ) को आमंत्रित किया गया था। मोहनदास नैमिशराय दलित साहित्य के शीर्षस्थ लेखक हैं । उनकी लगभग साठ से उपर पुस्तकें हैं । उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा,फिल्म लेखन ,नाटकों में अभिनय और निर्देशन भी किया। लेखक के साथ साथ वे एक जुझारू पत्रकार और सम्पादक भी रहे । यह सब करते हुए उन्होंने सारे देश का भ्रमण भी किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे।
उन्होंने बताया कि उन्होंने अठारह नौकरियां की है लेकिन अपने सामाजिक सरोकारों के कारण कहीं टिक न सके। वे लगातार सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और आज भी उतनी ही प्रतिबद्धता के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। इस समय के दौरान उन्होंने नौकरियां छोड़ी और आर्थिक संकट भी झेले। पारिवारिक उलझनें भी आई। उनका कहना था कि कि समाज के लिए अगर कुछ करना है तो उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। बिना कीमत चुकाए हम कुछ भी बड़ा काम नहीं कर सकते।
उनकी सभी पुस्तकों में वंचित तबकों और विशेषकर दलित समाज के प्रति गहरी चिंता है। वे स्वयं दलित समाज से होने के कारण इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं।
यह कार्यक्रम आलोचक और कवि डॉ. रतन सिंह ढिल्लों और डॉ सुदर्शन गासो की अध्यक्षता में किया गया जिसका संचालन प्रो. गुरुदेव सिंह देव ने किया। दलित विमर्श पर जवाब देते हुए उनका कहना था कि दलित संघर्ष में सभी वंचित तबकों को मिलकर यह लड़ाई लड़नी पड़ेगी और जाति विनाश करना होगा जैसा कि डॉ आम्बेडकर चाहते थे। बुद्ध, कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले, पेरियार, आम्बेडकर के संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा l
प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ पर दलित लेखकों की आपत्ति का ज़वाब देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी कहानी में दलित सवाल को सबसे पहले प्रेमचंद ने ही अपने उपन्यास और कहानियों में उठाया। कफन कहानी को प्रेमचंद की अन्य कहानियों जैसे ठाकुर का कुआं और सवा सेर गेहूं जैसी कहानियों से ही समझा जा सकता है। उनका कहना था कि प्रेमचंद दलित पीड़ा के प्रति बहुत संवेदनशील थे l वे उनका बहुत सम्मान करते हैं।
उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि उन्होने वेश्याओं और देवदासियों के जीवन पर पर शोध किया। वे बौद्ध भिक्षु भी रहे और भविष्य में पूरी तरह से बौद्ध भिक्षु बन जाने का निर्णय भी कर चुके हैं ताकि पूरी दुनिया घूम सकें।
इस समय देश में फैले हुए साम्प्रदायिक और जातीय माहौल पर उन्होंने काफी तल्ख टिप्पणियां की। उनका कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा तानाशाही पूर्ण माहौल कभी नहीं देखा। इस समय लेखक, पत्रकार, कलाकार, अध्यापक, बुद्धिजीवी आदि ईमानदारी से खुलकर अपनी बात नहीं रख सकते। हमें इस नकारात्मक माहौल को बदलना होगा ।
इस बातचीत और सवाल-जवाब को प्रो. रतन सिंह ढिल्लों,प्रो. सुदर्शन गासो, प्रो.गुरुदेव सिंह देव, तरसेम सिंह, आत्मा सिंह, गुरमीत सिंह, राजिंदर कौर, अनुपम शर्मा, सुनील शर्मा और एस पी भाटिया ने साहित्यिक और रचनात्मक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
