सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष का सफर – महावीर दहिया

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 93

 

सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष का सफर – महावीर दहिया

सत्यपाल सिवाच

महावीर प्रसाद दहिया (MP Dahiya) का जन्म 05 मार्च 1950 को तत्कालीन महेन्द्रगढ़ (अब दादरी) जिले के बड़े गांव बौंद में हुआ। उनकी माँ धर्मों घरेलू कार्यों व पशुपालन आदि के जरिए बच्चों के पालन पोषण सहयोग करती थी और पिता जी मकतूल सिंह जूते बनाने के अलावा खेती करते थे। वे दो भाई और दो बहनें हैं। वे एम.ए. राजनीति शास्त्र और एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त हैं। उन्होंने सन् 1966 में राजकीय उच्च विद्यालय बौंद से दसवीं परीक्षा पास की और इसके बाद सेवा में आ गए। नौकरी में आने के बाद बी.ए.और एम.ए. उपाधियां प्राइवेट छात्र के रूप में उत्तीर्ण की तथा एल.एल.बी. उपाधि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से संध्याकालीन संस्थान से नियमित रूप में की।

वैसे तो वे सन् 1969 में ही वैटरनरी ड्रेसर के रूप में नौकरी में आ गए थे। 10 सितंबर1971 को कृषि विभाग में नियमित आधार पर क्लर्क नियुक्त हो गए और भिवानी में नियुक्ति हुई। वे 31 मार्च 2008 को डिप्टी सुपरिटेंडेंट पद से अम्बाला से सेवानिवृत्त हुए।

महावीर दहिया का यूनियन से शुरुआती संपर्क 1986-87 के सर्वकर्मचारी संघ के आन्दोलन के समय ही हुआ। यूं तो कुरुक्षेत्र में ट्रेड यूनियन काऊंसिल की ओर से एफसीआई के कर्मचारी नेता ओमसिंह काउंसिल के कन्वीनर के नाते सभी कार्यालयों में जाकर कर्मचारियों को जोड़ने का काम कर रहे थे। महावीर पर भी उनके व्यक्तित्व की छाप बन रही थी। संघ के आह्वान पर 25 फरवरी 1987 सामूहिक आकस्मिक अवकाश आह्वान हुआ तो कृषि दफ्तर से वे और श्री बलबीर सिंह एडीओ ही शामिल हुए। बाद में उन्हें अपने विभाग में अन्य साथियों को भी जोड़ा।

शुरू में बिना पद ही सक्रिय रहे। सन् 1993 में उन्हें सर्र्चारी संघ का खंड कोषाध्यक्ष चुना गया। इसके बाद वे दो बार जिला सचिव और एक बार कुरुक्षेत्र जिले के प्रधान रहे।अम्बाला में बदली होने पर वे सेवानिवृत्त होने तक जिला प्रधान रहे। उन्होंने अपने विभाग में लिपिक वर्ग एसोसिएशन व हरियाणा मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन में भी काम किया।

उन्होंने एफसीआई के नेता ओमसिंह के जरिए ही आन्दोलन की गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया था और उन्हीं के प्रभाव से वामपंथी विचारधारा और राजनीति के प्रभाव में आए। वे स्वभाव से ही सटीक ढंग और सहज गति के साथ काम करने और गूढ़ बातों को समझने की कोशिश करते रहे हैं। इसीलिए जैसे-जैसे वैचारिक उन्नति हुई वे निरन्तर सक्रिय बने रहे। शुरू में तो फूलसिंह श्योकंद व बनवारीलाल बिश्नोई की भूखहड़ताल व बलिदान भावना के साथ जुड़े थे और बाद में वैचारिक दृष्टि से गहराई से जुड़ते गए। उसका परिणाम यह हुआ कि वे सेवानिवृत्त होने पर मजदूर संगठन सीटू से जुड़कर आंगनबाड़ी महिलाओं को प्रेरित करने में सक्रिय हो गए। वे पंद्रह साल तक आंगनबाड़ी हेल्पर व वर्करज यूनियन के राज्य कोषाध्यक्ष रहे और अब भी ऑडिटर का काम कर रहे हैं। इसके अलावा वे रिटायर्ड कर्मचारी संघ में भी राज्य ऑडिटर हैं। उन्हें कुछ समय मिड- डे मील में काम करने वाली महिलाओं को संगठित करने में समय लगाया। वे और स्वर्गीय मास्टर राजेन्द्र सिंह उनके संघर्ष में साथ रहे। वे उस संघर्ष के अनुभव को बहुत अच्छा मानते हैं।

महावीर प्रसाद दहिया  1989 में विधायक गुरुदयाल सिंह सैनी के निवास पर धरना देते हुए गिरफ्तार किए गए तथा सात दिन तक अम्बाला जेल में रहे। सन् 1993 के बड़े आन्दोलन में जेल भरो आह्वान पर गिरफ्तार करके बुडै़ल जेल चण्डीगढ़ भेजा गया। इस मौके पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। सन् 1998 में हिसार चल रही बैठक के समय सभी पदाधिकारी गिरफ्तार कर लिए गए और चार दिन बाद रिहा किया गया। उत्पीड़न की सभी कार्रवाइयां समझौतों के साथ समाप्त हो गई। उन पर सन् 1998 में कुरुक्षेत्र और हिसार दोनों जगह एस्मा के तहत मुकदमा दर्ज हो गया था। बाद में यह भी निरस्त हो गया।

वे महसूस करते हैं कि विभागीय संगठनों का सर्वकर्मचारी संघ से जुड़कर संघर्ष करना नयी मिसाल बन गया। हरियाणा के संघर्षों की चर्चा पूरे देश में होने लगी। उन्हें इस बात पर सदैव खुशी मिली कि परिवार की ओर से आन्दोलन और सामुदायिक गतिविधियों में पूरा साथ मिला। बच्चे छोटे थे। उनकी जीवन साथी राजपति बहुत ही मानवीय स्वभाव की थी। वे घर पर आए साथियों को चाय-भोजन किए बिना जाने नहीं देती थी। उन्हें लगता था कि संघर्षों में सच्चे, अच्छे और न्यायप्रिय लोग जुड़े हुए हैं। इसलिए वह भावात्मक रूप से ही समर्थक बन गई थी।

महावीर दहिया का स्थानीय विधायक अशोक अरोड़ा के अलावा वामपंथी नेताओं से ही संपर्क रहा। कभी किसी से कोई काम निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ी। बड़े प्रशासनिक अधिकारियों में श्री अशोक गर्ग सेवानिवृत्त आईएएस उन्हें जानते हैं। उनके सहयोग से एक जरूरतमंद महिला को आंगनबाड़ी में समायोजित करवाया था। वे अशोक गर्ग के मानवीय स्वभाव और संवेदनशील व्यवहार के प्रशंसक हैं। उन्हें ऐसा कुछ याद नहीं है जिस काम के लिए उन्हें पछतावा हुआ हो। उन्हें लगता है कि वर्तमान दौर यूनियन कार्यकर्ता/नेता पढ़ाई नहीं करते। इसलिए विचारों व कार्यप्रणाली में गहराई नहीं आ पाती। वे समझते हैं कि वैचारिक स्तर के लिए काम करें तभी संघर्ष को सही दिशा मिल सकती है। इसके अलावा राजनीतिक स्थिति की सूझबूझ भी जरूरी है।

उन्हें महसूस होता है कि अब पहले की तरह जुझारू संघर्ष नहीं रहे हैं। अधिकतर गतिविधियां औपचारिकता के रूप में आयोजित की जाती हैं। ऐसे कार्यकर्ता नेतृत्व तक पहुंच गए जो निर्णायक और जुझारू संघर्षों की आग से नहीं निकले हैं। उन्हें लगता है कि हमारे साथियों में हरियाणा कर्मचारी महासंघ का कॉडर आ गया है जो लड़ाकू नहीं है। आम कर्मचारी से संपर्क सीधे दफ्तर या घर जाकर नहीं किया जा रहा है,बल्कि टेलीफोन व वाटस्एप के जरिए संपर्क साधा जाता है।

महावीर दहिया का विवाह जून 1976 में सुश्री राजपति से हुआ। उनके दो बच्चे हैं। बेटी सोनिया एमबीबीएस,एमडी करके पीजीआई,रोहतक में प्रोफेसर (गाइनेकोलॉजिस्ट) नियुक्त हैं और बेटा अश्विनी कुमार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर है। महावीर दहिया की जीवनसंगिनी का दिसंबर’2009 में देहांत हो गया था।

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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