सोने की लाठी: चमकते डॉलर और सिसकती तन्हाई

समय समाज

सोने की लाठी: चमकते डॉलर और सिसकती तन्हाई

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

रिटायर्ड शर्मा जी ने गर्व से मोहल्ले में मिठाई बांटी, “बेटा अमेरिका में सेटल हो गया है!”

साल बीते, अब घर में सन्नाटा है। तेज बुखार में लेटे शर्मा जी फोन उठाते हैं, उधर से बेटा कहता है, “पापा, दवाई मंगा लीजिये, पैसे भेज दिए हैं।”

शर्मा जी ने तकिया गीला करते हुए सोचा- “पैसे तो आ गए, पर पानी कौन पिलाएगा?”

जब बच्चे अपनी प्रगति की उड़ान भरकर सात समंदर पार चले जाते हैं तो पीछे रह जाते हैं वे बूढ़े मां-बाप, जिनका पूरा संसार उन्हीं बच्चों के इर्द-गिर्द सिमटा था। इसे मनोवैज्ञानिक शब्दावली में ‘एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम’ कहा जाता है। भारत में यह समस्या और भी विकराल है, क्योंकि यहाँ पारिवारिक जड़ें बहुत गहरी होती हैं।

विदेश में बसा बच्चा ‘सोने की लाठी’ की तरह होता है-कीमती, प्रतिष्ठित और चमकदार। वह हर महीने बैंक खाते में बड़ी रकम डाल देता है। घर में नौकर-चाकर, एसी, और आधुनिक मशीनें लग जाती हैं। समाज कहता है, “शर्मा जी की किस्मत खुल गई।”

लेकिन कड़वा सच यह है कि सोने की लाठी चमक तो सकती है, पर जब पैर लड़खड़ाएं, तो सहारा देने के लिए उसे पास होना जरूरी है। बूढ़े माता-पिता को डॉलर से ज्यादा उस कंधे की जरूरत होती है, जिसे पकड़कर वे आंगन में टहल सकें।

दीवाली हो या जन्मदिन, अब खुशियां ‘वीडियो कॉल’ की स्क्रीन तक सीमित हैं। मां पकवान तो बनाती है, पर चखने वाला कोई नहीं होता। जब बच्चा स्क्रीन पर “आई मिस यू मां” कहता है तो मां मुस्करा कर फोन काट देती है, लेकिन उसके बाद घंटों उस अंधेरे कमरे में अकेली बैठी रहती है।

यह डिजिटल प्यार पेट तो भर सकता है, पर मन की भूख नहीं मिटाता।

वृद्धावस्था में सबसे बड़ा डर बीमारी का नहीं, बल्कि ‘अकेलेपन में होने वाली बीमारी’ का है। रात के 2 बजे अगर सीने में दर्द उठे, तो हाथ सबसे पहले मोबाइल की जगह बगल वाले खाली कमरे की तरफ जाता है।

‘सोने की लाठी’ (विदेश में बैठा बच्चा) वहां तुरंत नहीं पहुंच सकता। वह फोन पर परेशान हो सकता है, एम्बुलेंस बुला सकता है, लेकिन उस वक्त हाथ थामने का जो ढांढस होता है, उसकी भरपाई कोई पैसा नहीं कर सकता।

अजीब विडंबना है कि ये माता-पिता अपनी पीड़ा किसी से कह भी नहीं पाते। अगर वे अपनी तन्हाई का जिक्र करें तो लोग कहते हैं, “बच्चे इतना कमा रहे हैं और आपको क्या चाहिए?”

वे अपनी संतान की सफलता के कैदी बन जाते हैं। वे नहीं चाहते कि उनकी वजह से उनके बच्चे का ‘करियर’ खराब हो, इसलिए वे फोन पर हमेशा कहते हैं-“बेटा, हम यहाँ एकदम ठीक हैं, तुम अपनी चिंता करो।”

यह झूठ दुनिया का सबसे पवित्र और सबसे दुखद झूठ है।

जिन माता-पिता के बच्चे पास होते हैं, वे अक्सर अपने नाती-पोतों की बातें करते हैं। जिनके बच्चे विदेश में हैं, वे केवल ‘डॉलर की दर’ या ‘वीजा’ की बातें कर पाते हैं।

धीरे-धीरे वे खुद को समाज से कटा हुआ महसूस करने लगते हैं। उनके बड़े बंगले अक्सर जेल की तरह लगने लगते हैं, जहाँ यादों के सिवा कोई मेहमान नहीं आता।

सफलता बुरी नहीं है और बच्चों का आगे बढ़ना हर माता-पिता का सपना होता है। लेकिन क्या उस सफलता की कीमत इतनी बड़ी होनी चाहिए कि बुढ़ापा बेसहारा हो जाए? ‘सोने की लाठी’ बेशक महंगी है, लेकिन वह उस पुरानी ‘लकड़ी की लाठी’ का विकल्प नहीं हो सकती जो हर कदम पर शरीर का भार उठाती है।

अंतिम सत्य यही है कि बुढ़ापे में इंसान को ‘स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग’ की नहीं, बल्कि ‘स्टैंडर्ड ऑफ लविंग’ की जरूरत होती है। उन माता-पिता के लिए, जिनके बच्चे दूर हैं, हर रात एक सवाल छोड़ जाती है-“क्या ये तमाम सुख-सुविधाएं उस एक पल के सुकून की बराबरी कर सकती हैं, जब बच्चा पास बैठकर कहे, ‘पापा, मैं हूँ न’?”

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