बात बेबात
इकोनॉमी क्लास ने सीट बेल्ट बांध लें
विजय शंकर पांडेय
वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया कि महंगाई कोई बड़ी चिंता नहीं है। यह सुनते ही सब्ज़ी वाले ने राहत की सांस ली और दाम फिर से बढ़ा दिए। क्योंकि जब चिंता नहीं है, तो छूट कैसी? टमाटर ने मुस्कुराते हुए कहा—“मैं तय सीमा में ही हूँ, बस आम आदमी की पहुंच से बाहर।”
मंत्री जी बोलीं, महंगाई काबू में है। उधर आम आदमी बोला—“बिल्कुल, काबू में है… बस काबू मेरा नहीं रहा।” गैस सिलेंडर ने थपकी दी—“हिम्मत रखो, मैं भी उम्मीद में हूँ।” पेट्रोल ने कहा—“मैं तो भावनात्मक रूप से महंगा हूँ।”
बजट 2026 की पहचान बताई गई—कस्टम्स सुधार। सीमा शुल्क इतना सुधर गया कि सीमा पर खड़े कंटेनर भी योगासन करने लगे। व्यापार खुश, निवेश प्रसन्न, और आयातित चीज़ें बोलीं—“अब हम सीधे ड्रॉइंग रूम में उतरेंगे।” देसी उद्योग ने पूछा—“और हम?” जवाब मिला—“आप आत्मनिर्भर हैं, आत्मसंतोष रखिए।”
सरकार का कहना है कि सुधारों से कारोबार उड़ेगा। आम आदमी ने पूछा—“किस क्लास में?” जवाब आया—“बिज़नेस क्लास।” इकोनॉमी क्लास ने सीट बेल्ट बांध ली।
अंत में वित्त मंत्री का आत्मविश्वास चमका—महंगाई तय सीमा में है। सीमा कौन तय करता है? शायद वही, जो बाजार में नहीं जाता। और कस्टम्स सुधर गए हैं—बस किचन के कस्टम्स अभी अपडेट का इंतज़ार कर रहे हैं।

लेखक -विजय शंकर पांडेय
