हिमाचल की दृष्टि में बजट
कुलभूषण उपमन्यु
हिमाचल प्रदेश विशिष्ट भौगोलिक एवं पारिस्थितिक प्रकृति वाला राज्य है जो अति संवेदनशील है. नाजुक पर्वतीय ढलानें, आवागमन की समस्याएं, इसे हाशिए पर ले जाती हैं. किन्तु परिस्थितियों के अनुकूल ढलने वाला जनमानस, निष् उत्पाद, और विविधता इसकी शक्ति भी हैं. हमारी विकास योजनाओं ने लगातार इस क्षेत्र की संवेदनशीलता की अनदेखी करके विकास का मॉडल अपनाया जो मुख्य धारा क्षेत्रों के लिए भले ही ठीक हो किन्तु इन संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों के अनुकूल नहीं है.
जलवायु परिवर्तन और अवैज्ञानिक ढांचागत विकास कार्यों के चलते राज्य लगातार पिछले दशक से प्राकृतिक आपदाओं से घिरता जा रहा है. प्रदेश 2023 की वर्षा कालीन बाढ़, भूस्खलन जनित आपदा से उबर भी न पाया था कि 2025 में फिर से बरसात गंभीर संकट लेकर पंहुच गई. मंडी, सिमौर, और चंबा जिले सर्वाधिक प्रभावित हुए. हिमाचल सरकार ने यथा सामर्थ्य राहत कार्य करने का प्रयास किया है किन्तु धन अभाव में अधिकांश कार्य लटका पड़ा है.
इस बजट से उम्मीद थी कि सरकार पर्वतीय कठिनताओं को ध्यान में रख कर उदार सहायता देने का प्रयास करेगी. किन्तु प्रधानमन्त्री जी द्वारा घोषित 1500 करोड़ के अनुदान का भी जिक्र बजट में नहीं है. जाने केंद्र सरकार किस तरह से यह सहायता राशि प्रदेश को उपलब्ध करवाएगी और पूरी जरूरतों की भरपाई कर पाएगी. अभी तक 2023 की आपदा के जख्म भी भरे नहीं हैं. राज्य सरकार साधन विहीन है, और प्राकृतिक आपदाएं साल दर साल बढ़ती ही जा रही है.
जलवायु परिवर्तन का दंश जितनी जनधन की हानि कर रहा है उतना आर्थिक बोझ उठाने में प्रदेश सर्वथा असमर्थ है, यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए थी. किन्तु आपदा प्रबन्धन व राहत की दृष्टि से बजट में कुछ नहीं है. 16 वें वित्तायोग ने बजट डेफिसिट ग्रांट भी बंद कर दी है जिससे प्रदेश को प्रति वर्ष 10,000 करोड़ का घाटा होने का अनुमान है. जिससे प्रदेश की आर्थिक स्थिति और कमजोर होगी जिससे आपदा राहत कार्य और दबाव में आ जाएगा.
हिमाचल प्रदेश की सामाजिक संस्थाओं ने राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन अथोरिटी और वित्त मंत्री जी को हिमाचल प्रदेश के लिए विशिष्ट आपदा फण्ड के लिए बजट में प्रावधान करने की मांग की थी जिसमें जलवायु नियंत्रण और अनुकूलन, आपदा तैयारी, प्रतिक्रिया और राहत, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, जलवायु आधारित विस्थापन, पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील ढांचागत व्यवस्था, सामाजिक संस्थाओं की भूमिका, आदि मुद्दों को ध्यान में रख कर बजट प्रावधान करने की मांग की गई थी.
किन्तु इस दृष्टि से कुछ सामने नहीं आया. उद्योगों को भले ही राहत प्रदान की गई है किन्तु इसका पर्वतीय समाज ज्यादा लाभ नहीं उठा पाएगा. यहां की रोजगार की रीढ़ कृषि, बागवानी,और पशु पालन हैं. बागवानी में सेव उत्पादकों को उम्मीद थी कि सेव आयत पर उचित शुल्क लगा कर स्थानीय उत्पादन को संरक्षण मिलेगा, किन्तु नहीं हुआ.
पर्वतीय कृषि को वन्य पशुओं से विशेष कर बंदर, सूअर, नीलगाय आदि से भारी नुकसान पंहुच रहा है. कई जगह किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हुए है. इस दिशा में मानव-वन्यप्राणी संघर्ष कम करने की जरूरत है. बाड़ बंदी आदि के लिए उदार सहायता के प्रावधान होंने चाहिए. जैविक खेती को प्रोत्साहन बढाए जाने की जरूरत है.
सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के लिए उदार बजट स्वागत योग्य है. जिसका लाभ प्रदेश के मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के लोग भी उठा सकते हैं. पशुपालन के लिए भी कुछ राहत दी गई है किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन चरागाह विकास पर निर्भर करता है क्योंकि यहाँ भूमि की जोतें बहुत छोटी हैं. 70% जोतें एक हेक्ट. से भी छोटी हैं, उनमें से भी अधिकांश एक एकड़ से भी छोटी हैं.
इतनी कम जमीन पर घास उगाना अंतिम प्राथमिकता रहती है. प्रदेश की अधिकांश चरागाहें एकल प्रजाति चीड़ और खरपतवारों की भेंट चढ़ चुकी हैं किन्तु उनके सुधार के लिए कोई योजना नहीं है. केंद्र सरकार जलागम विकास जैसे कार्यक्रमों द्वारा इस कार्य को कर सकती थी किन्तु जमीनी समस्याओं की अनदेखी पशुपालन व्यवसाय को लाभकारी बनाने में सफलता को बाधित करने वाली है. प्रदेश घास के अकाल से पीड़ित है और पंजाब और हरयाणा से भूसा (तूड़ी) आयात करने हेतु मजबूर है.
कुल मिला कर देखा जाए तो बजट में पर्वतीय संवेदनशील परिस्थिति को नजरअंदाज किया गया है. सबसे बड़ी चिंता तो इस बात की है कि गत वर्षों की आपदाओं में उजड़े लोग कैसे पुनर्वासित होंगे. और आने वाली बरसातों में जहां आपदा का भय बना रहेगा वहीं जलवायु नियंत्रण और अनुकूलन जैसे दीर्घ कालीन उपायों के अभाव में, आने वाले समय में भी पर्वतीय क्षेत्र आपदामुक्त हो पाएंगे यह संभव नहीं होगा.
सरकार से आग्रह है कि वैज्ञानिक संस्थानों से इस विषय पर उचित सलाह के आधार पर बजट में प्रावधान किये जाएं. पर्वतीय क्षेत्रों में ढांचागत विकास में भी विशेष सावधानी और उन्नत तकनीक प्रयोग की जरूरत है, सड़क निर्माण मंत्री नितिन गडकरी जी ने स्वयं यह माना था कि डी.पी.आर. बनाने वाली कंपनियों ने और ठेकेदारों ने लापरवाही की है जिससे आपदा में वृद्धि हुई.
इस बजट में पर्वतीय क्षेत्रों में बृहद ढांचागत निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और बेहतरीन तकनीक इस्तेमाल करने के लिए क्या प्रावधान किये गए हैं यह सुनिश्चित नहीं है. आशा है आवश्यक संशोधन संभव हो सकेंगे और हिमालय क्षेत्र के पर्यावर्णीय सेवा प्रदाता के रूप में योग दान को ध्यान में रखते हुए और पूरे देश को मिल रही पर्यावर्णीय सेवाओं से मिलने वाले लाभ को टिकाऊ बनाने के लिए हिमालय के टिकाऊ विकास के लिए समर्पित बजटीय प्रावधान किये जाएंगे.
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