पुस्तक मेला और हम
जगदीश्वर चतुर्वेदी
हिन्दी किताबों के बाजार को मंदा करने में शिक्षकों की बड़ी भूमिका है, आमतौर पर कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षक किताबें नहीं खरीदते,वे मुफ्त में किताबें जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। हिंदी वाले इस मामले में अव्वल हैं।
हिन्दी के शिक्षकों में ही यदि किताब खरीदने की प्रवृत्ति पैदा हो जाए तो हिन्दी की किताबों को एक ठोस खरीददार मिल जाए।पता नहीं क्यों ये लोग किताबें नहीं खरीदते,मित्रो,जागो,किताबें खरीदो,कुछ तो शर्म करो,सालों -साल हिन्दी की पगार पाते हो,उससे गहने खरीदते हो,फ्लैट खरीदते हो,कार खरीदते हो,महंगे जूते खरीदते हो,लेकिन किताबें नहीं खरीदते,कुछ तो शर्म करो !
किताबों के लिए आज साक्षर-शिक्षित लोग ही सबसे बड़ी चुनौती हैं,वे किताबें नहीं पढ़ते,किताबों को साक्षरता से जोड़कर न देखें। हिन्दी का शिक्षितवर्ग,हिन्दी के शिक्षक आदि ही यदि दस फीसदी किताबें खरीदें और पढ़ें तो किताबों के बाजार में चमक लौट आए। असल में किताब खरीदने के मामले में मध्यवर्ग सबसे निकम्मावर्ग है।
कलकत्ते के विश्व पुस्तक मेले में जब पहलीबार1989 में गया तो एक वाकया आँखों के सामने घटित हुआ जिसने बेहद प्रभावित किया।मैं किताबों की दुकानों पर घूम रहा था, देखा एक दुकान पर महाश्वेता देवी बैठी हैं,मैं भी उत्सुक होकर उनको निहारने लगा,अचानक देखता हूँ,मेरे पीछे एक शादीशुदा नवयुवती खड़ी है,बोली जरा हटिए,मैंने पूछा कुछ लेना है, बोली हां, मेरी कल शादी हुई है,मैं महाश्वेताजी से आशीर्वाद लेने आई हूँ।

लेखिका -लेखक से शादी के बाद पुस्तक मेले में आशीर्वाद लेने कोई आए यह बात मुझे अंदर तक स्पर्श कर गयी।यह है लेखक की सामाजिक सत्ता की मौजूदगी।कलकत्ते में इसे सहज ही महसूस कर सकते हैं।
कलकत्ते में किसी भी दुकानदार या नागरिक को पता लगे कि आप लेखक हैं तो सामने वाला बहुत ही अदब से पेश आता है,उसके बाद आपको यह एहसास होता है कि आपका लेखन समाज में आदर पाता है।लेकिन दिल्ली या हिंदी क्षेत्र में ऐसा नहीं है।
दिल्ली पुस्तक मेले का एक वाकया है-मैं एकबार जेएनयू में पढ़ते समय सन्1981-82में दिल्ली बुकफेयर गया और वहां से जाकर बहुत सारी किताबें खरीद लाया,उनमें एक किताब जनेश्वर वर्मा की भी थी,नाम था ” हिन्दी काव्य में मार्क्सवादी चेतना”बुकफेयर में इस किताब की एक ही प्रति थी,मेरे बाद गुरूवर नामवर सिंह बुकफेयर गए,वे भी उस दुकान पर गए जहां से मैंने वर्माजी की किताब खरीदी थी,उन्होंने दुकानदार से पूछा कि वर्माजी की किताब नहीं लाए,दुकानदार बोला लाया था,जेएनयू का एक छात्र खरीदकर ले गया,नामवरजी ने हुलिया पूछा,दुकानदार ने कहा गोरा सा था देखने में,कह रहा था जेएनयू में हिन्दी पढ़ता हूं,नामवरजी समझ गए कि मैं किताब ले गया हूं,नामवरजी कैम्पस लौटे और आते ही सीधे अपने नौकर को मेरे पास होस्टल भेजा और तुरंत मिलने को कहा,मैं तुरंत उनके पास गया ,बोले मुझे जनेश्वर वर्मा की किताब आज ही पढ़ने को दो,मैं पहले पढूँगा,तुम बाद में पढ़ लेना,मैंने कहा ऐसा क्या है उसमें वे बोले मैं वर्षों से इंतजार कर रहा हूँ उस किताब का,मैं बुकफेयर में उसे खरीदना चाहता था लेकिन तुम मुझसे पहले खरीद लाए,बुकफेयर में उसकी और कोई प्रति नहीं मिली, मैंने उनको तुरंत वह किताब लाकर दे दी,नामवरजी ने पढ़ने के बाद वह किताब मुझे वापस दे दी। इस घटना ने मेरे किताब प्रेम को और भी गाढ़ा कर दिया।
मैंने 1979 से अब तक कभी पुस्तक मेले में जाना बंद नहीं किया ,सन् 2019 का मेला अपवाद है।जब जेएनयू में पढ़ता था तब भी नियमित पुस्तकमेला जाता था,पढाई के बाद भी यह सिलसिला बना हुआ है,इस साल नहीं जा पाऊंगा , इसके अलावा कलकत्ते के पुस्तक मेले में विगत 27 साल से नियमित गया हूँ।
कलकत्ते में किताबें और जनता को देखने का सुख मिलता है,वहीं दिल्ली में किताबें देखने का।
पुस्तकें हमारे जीवन का पर्याय हैं लेकिन हमने कभी इस बात को गंभीरता से महसूस नहीं किया।
प्लीज,इतने खुदगर्ज न बनो कि किताबों की समस्याएं आपको नजर ही न आएं।
