जनवादी सोच के साहित्यकारों को एकजुट करना सबसे बड़ी जरूरत
जनवादी लेखक संघ के स्थापना दिवस पर सरधना में आयोजित की गई विचार गोष्ठी
मेरठ। जनवादी लेखक संघ के 45वें स्थापना दिवस पर सरधना (मेरठ) में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का उद्घाटन करते हुए जनवादी लेखक संघ मेरठ के जिला सचिव मुनेश त्यागी ने कहा कि आज तमाम लेखकों, कवियों, साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों में जनवादी सोच और विचारधारा की मशाल को जलाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। आजादी के 79 वर्षों के बाद भी भारतीय समाज में जातिवाद, छुआछूत, अंधविश्वास, रुढ़िवादिता, सांप्रदायिकता और अलगाववाद को फैलाने वाली सामंती, साम्राज्यवादी, पतनशील पूंजीवादी सोच और साम्प्रदायिक सोच की ताकतों का गठजोड़ जारी है।
उन्होंने कहा कि बहुत सारे लेखक राजनीति से भागते हैं जबकि आज के समय में राजनीति से भागने की नहीं बल्कि तमाम तरह की राजनीति को जानने की जरूरत है। जन कल्याणकारी राजनीति करके ही देश के तमाम मेहनतकशों यानी किसानों और मजदूरों का कल्याण किया जा सकता है। उनके हितों की राजनीति के बारे में लिखने की सबसे ज्यादा जरूरत है। वर्तमान में लेखक संगठनों की एकता और दक्षिणपंथी वामपंथी विचारधारा के बारे में जानना और लिखना बेहद जरूरी हो गया है।
मुनेश त्यागी ने कहा कि आज जनता को सबसे ज्यादा खतरा धर्मांधता फैलाने और धर्म और धर्मनिरपेक्षता पर हमले करने से पैदा हो गया है। ज्ञान, विज्ञान और विवेक की संस्कृति पर सबसे ज्यादा हमला किया जा रहा है। हमारे देश में हिंदू – मुस्लिम सांप्रदायिकता को अंग्रेजों ने जन्म दिया था जिसका मुख्य काम जनता में धर्म के नाम पर विवाद झगड़ा पैदा करना, नफरत फैलाना और जनता की एकता को तोड़ना था। तब ये सांप्रदायिक ताकतें अंग्रेजों की मदद कर रही थीं। इनका भारत की आजादी के आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। आज ये सांप्रदायिक ताकतें खुलकर देसी- विदेशी साम्राज्यवादियों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए नीतियां बना रही हैं और जनता की एकता तोड़ने के लिए समाज में हिंदू मुस्लिम के नाम पर नफरत और हिंसा फैल रही हैं।
ये साम्प्रदायिक ताकतें आज भाषाओं के नाम पर विवाद पैदा कर रही हैं। हम देख रहे हैं कि इन सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों ने संविधान के रहते संविधान की हत्या कर दी है। आज हमें मनुवादी हिंदुत्ववादी सोच की जनविरोधी राजनीति को जानना पहचाना और इस पर लिखना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है। इन परिस्थितियों में आज के तमाम लेखकों , कवियों, साहित्यकारों और पत्रकारों की व्यापक एकता कायम करना बेहद ज्यादा जरूरी हो गया है आज हिंदू मुस्लिम एकता के इतिहास को जानना और इसे जनता को अवगत कराना बेहद जरूरी हो गया है।
जिस तरह से दुनिया भर की साम्राज्यवादी ताकतें एकजुट होकर यूनएनओ और अंतरराष्ट्रीय कानून पर हमले कर रही हैं और पूरी दुनिया पर अपना कब्जा करना चाहती हैं ।इन सबके बारे में जानना और इसकी पूरी जानकारी जनता को उपलब्ध कराना, भारत के सारे जनवादी लेखकों का सबसे बड़ा काम हो गया है। वर्तमान जनवादी लेखकों की सबसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी हो गई है कि वे पूरी जनता को धर्म, समता, समानता, भाईचारे, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, साम्राज्यवाद और क्रांति के बारे में जानकारी दें और अपने सदस्यों को जनवादी लेखक संघ के बुनियादी सिद्धांतों से अवगत करायें, तभी जाकर संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को धरती पर उतारा जा सकता है।
इस मौके पर जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रामगोपाल भारतीय ने अपने लेख में कहा है कि आज हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास में रुकावट पैदा हो गई है। आज की जो परिस्थितियों दिखाई दे रही हैं वे बहुत ज्यादा आशाजनक नहीं हैं। आज भारत के सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारे और गंगा जमुनी तहजीब की धरोहर नफरत से भर गई है और देश की रीड माने जाने वाले किसान और श्रमिकों के हालात वद से बेहतर हो गए हैं।
राजनीतिक क्षेत्र में भी हम आज देखते हैं कि धर्म और जाति के नाम पर जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोगों द्वारा नफरती भाषण दिए जा रहे हैं जो समाज को तोड़ने का काम कर रहे हैं। शिक्षा संस्थानों का निजीकरण और सरकारी स्कूलों का बंद होते जाना समाज और गरीब जनता के हितों के खिलाफ है। इन विषम परिस्थितियों का चिंतन करना देश की हर नागरिक का कर्तव्य है और जनवादी लेखक संघ के सदस्य होने के नाते हमारा समाज और देश के प्रति दायित्व और बढ़ जाता है क्योंकि हम आंख मूंदकर किसी भी सरकार के, किसी भी व्यवस्था के प्रतिगामी कदमों का समर्थन नहीं कर सकते और समाज के कमजोर वर्गों किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों सरकारी, गैर सरकारी कर्मचारी और विकास की दौड़ में सबसे पीछे पंक्ति के खड़े व्यक्तियों के हितों का हमें रक्षक बनना है। हमारा दायित्व है कि हम समाज में जाकर रोजी-रोटी के सवालों पर व्यवस्था से सवाल करें और अपने अधिकारों के लिए अंतिम समय तक संघर्ष करते रहें। हम अहिंसक, शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक बदलाव के पक्षधर हैं, इसलिए हम भारतीय संविधान के आलोक में ही अपनी बात रखें और देश और समाज को उन्नति के मार्ग पर ले जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रयास करें।
जनवादी लेखक संघ मेरठ के उप सचिव मंगल सिंह मंगल ने कहा कि आज शासक वर्ग की तमाम ताकतें धर्मांधता, अन्धविश्वास और जनता में गलत विचार फैलाकर उसे गुमराह कर रही हैं। वे हिंदू मुसलमान के बीच विवाद पैदा करके लोगों को भटका रही हैं, उसकी एकता तोड़ रही हैं। ऐसे में तमाम लेखकों को एकजुट करना और सरकार की गलत नीतियों के बारे में जनता को अवगत कराना उन पर लिखना और उनके बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी हो गया है। इसके लिए जरूरी हो गया है कि लेखकों, कवियों, कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को एकजुट किया जाए और उन्हें वैचारिक रूप से मजबूत करने के लिए सम्मेलन, गोष्ठियां और कार्य शिविरों का आयोजन किया जाए और उसकी सांस्कृतिक चेतना को बढ़ाया जाए।
जिला कमेटी सदस्य जितेंद्र पांचाल ने इस विचार गोष्ठी और स्थापना दिवस को मनाने में अहम भूमिका अदा की और उन्होंने कहा कि आज लेखकों को एकजुट करना, हिंदू मुस्लिम एकता पर विचार गोष्ठियां करना, महिला अपराध के खिलाफ गोश्तियां करना बेहद ज्यादा जरूरी हो गया है। उन्होंने ज़ोर दिया कि लेखक और कवियों के साथ-साथ छात्रों नौजवानों के बीच जाकर उन्हें साझी संस्कृति, विवेक, वैज्ञानिक संस्कृति के बारे में जानकारी दी जाए और उन्हें भी जनवादी लेखक संघ के दायरे में लाया जाए।
गोष्ठी की अध्यक्षता आगा मोहम्मद अली शाह और संचालन जितेंद्र पांचाल ने किया। इस मौके पर डॉक्टर ताहिर हनफी, शाहिद मिर्जा, इरफान जावेद सिद्दीकी, शहजाद सितारा, मनमोहन त्यागी, एस ए बेताब, निजाम अंसारी, असद गालिब, मयंक त्यागी, संयम पांचाल, अंकुर फोगाट आदि लेखक, कवि और शायर उपस्थित थे।
