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मुनेश त्यागी की कविता- चाहतें उनकी और हमारी

कविता चाहतें उनकी और हमारी मुनेश त्यागी     हमारी चाहत है, रोटी, कपड़ा और मकान। वो चाहते हैं, हिंदू…