पुण्यतिथि पर विशेष
सिल्विया प्लाथ की कविताएं आत्मकथा नहीं, आत्म-ध्वनियाँ हैं
त्रिभुवन
“दॅ बेल जार” और “एरियल” जैसी हृदयहारी कृतियों की रचयिता सिल्विया प्लाथ आज ही के दिन (11 फरवरी) 1963 में सिर्फ़ तीस साल की उम्र में इस ख़ला में खो गई थीं। उन्हें “कन्फ़ेशनल” कहकर निपटा देना वैसा ही है जैसे समुद्र को “गीला” और “नमकीन” कहकर भूल जाना। उनकी कविताएँ आत्मकथा नहीं, आत्म-ध्वनियाँ हैं। एक ऐसी प्रयोगशाला, जहाँ भाषा अपने ही भीतर रसायन बनती और टूटती है। प्लाथ के यहाँ “मैं” निजी नहीं रहता; वह एक मंच बन जाता है, जिस पर इतिहास, स्त्रीत्व, हिंसा, सौंदर्य और मृत्यु सहित सब कुछ अपने-अपने मुखौटे पहनकर आते हैं। इसलिए उनका लेखन केवल भावनात्मक उद्घाटन नहीं, ध्वनि, बिंब और संरचना का कड़ा अनुशासन भी है।
उनका काव्य-शिल्प अक्सर तीखे, चमकदार और मन को उद्वेलित करने वाले टुकड़ों में बोलता है। जैसे कोई वाक्य “कह” नहीं रहा, “काट” रहा हो। प्लाथ की पंक्तियों में कठोर व्यंजन, तेज़ अनुप्रास, और अचानक ब्रेक या एंजैम्ब्मेंट लय बनाकर ऐसा संगीतात्मक भावबोध रचते हैं, जो मीठा नहीं, चेतावनी-सा लगता है। यह ध्वनि-प्रयोग उनके अर्थ का विस्तार है। आवाज़ ही उनकी कविता में मनोदशा नहीं, एक नैतिक मौसम बन जाती है। उनकी नाना छवियाँ बर्फ़, धातु, शीशा, रक्त, रसोई, अस्पताल, और चमकते हुए घरेलू उपकरण मानो आधुनिकता की घरेलू सभ्यता को भीतर से एक्स-रे कर देती हैं।
प्लाथ के प्रतीक-विश्व का एक बड़ा स्तंभ “पिता-आर्केटाइप” है; पर यह केवल निजी पिता का शोक नहीं। “डैडी” जैसी कविताओं में यह आकृति सत्ता, डर, भाषा-आधारित प्रभुत्व और स्मृति की तानाशाही का संयुक्त रूप ले लेती है। पिता यहाँ व्यक्ति कम, एक संरचना अधिक है। वह सत्ता जो भीतर भी बैठती है और बाहर भी। इसी वजह से प्लाथ का संघर्ष केवल निजी दु:ख की कथा नहीं; वह आधुनिक आत्मा के उस हिस्से की कथा है जो किसी प्राधिकार से मुक्त होना चाहता है, पर उसकी छाया भाषा में बनी रहती है। कई भारतीय कवियों ने उनके पिता को अपने यहााँ लाना चाहा; लेकिन वह पिता उनकी कविताओं में उसी रूढ़िवादी और पितृसत्ता का गौरवान्वयन बनकर ही रहा।
और फिर जब हम उनकी मधुमक्खियों वाली कविताओं को देखते हैं तो वे हमें अपने स्वप्निल संसार के यथार्थ की याद दिलाती हैं। सिल्विया की मधुमक्खियाँ साधारण प्रकृति-चित्र नहीं, श्रम, समुदाय, स्त्री-देह, सृजनशीलता और नियंत्रण की राजनीति का सूक्ष्म रूपक बन जाती हैं। इन कविताओं में “छत्ता” एक साथ घर भी है और व्यवस्था भी; शहद एक साथ मिठास भी है और श्रम का अर्क भी। प्लाथ यहाँ चीख़ से नहीं, नियंत्रित चमक से काम लेती हैं। जैसे भावनाएँ शीशे में बंद हों, पर रोशनी फिर भी रिसती रहे।
कई साल पहले जब किसी फटी पुरानी पत्रिका में, शायद इलैस्ट्रेटिड वीकली, मैंने
“एरियल” पढ़ी तो उसका प्रसंग मन में बैठ गया। यह उनकी काव्य-नियति का सबसे संवेदनशील मोड़ है। मूल पांडुलिपि के क्रम और बाद में प्रकाशित संग्रह के क्रम के बीच जो अंतर बताया जाता है, उसे अक्सर “विवाद” कहा गया। पर इसे केवल पारिवारिक संघर्ष का सनसनीख़ेज़ किस्सा बनाना प्लाथ के साथ अन्याय होगा। असल प्रश्न यह है कि कविता का ‘क्रम’ क्या अर्थ का भाग है? “एरियल” को जिस तरह पढ़ा जाता है, उस पर क्रम का प्रभाव पड़ता है। यह एक साहित्यिक तथ्य है, कोई गॉसिप नहीं।
प्लाथ की मृत्यु को रोमानी बनाना आसान है; कठिन यह समझना है कि उनका लेखन जीवन के विरुद्ध नहीं, जीवन के भीतर सत्य के लिए जिजीविषा जैसा था। एक ऐसा सत्य जो सुंदर हो सकता है, पर आरामदेह नहीं। वे केवल पीड़ा की कवयित्री नहीं; वे भाषा की एक कठोर कारीगर थीं। वे अनुभूतियाें की शिल्पकार थीं। वे शब्दों की अरणियों को इतना तेज़ घिसती थीं कि उनमें से चमक भी निकलती और चिंगारी भी। उनकी कविता हमें यह नहीं सिखाती कि टूटना महान है; वह यह सिखाती है कि भाषा के भीतर सत्य का साहस कैसे जन्म लेता है और कैसे, कभी-कभी, वही साहस किसी सभ्य समाज की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है।
त्रिभुवन के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक- त्रिभुवन
