जागरूक और संघर्षशील हैं सिल्कराम मलिक

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 106

जागरूक और संघर्षशील हैं सिल्कराम मलिक

सत्यपाल सिवाच

 

सिल्कराम मलिक नौकरी से रिटायर हो चुके हैं लेकिन अभी भी सोनीपत में उन्हें पहले सा ही रुतबा मिला हुआ है। मैकेनिकल वर्करज यूनियन के मंच से शुरू होकर कर्मचारी आन्दोलन में उन्होंने लम्बी लड़ाई में डटे रहने वाले जागरूक कार्यकर्ता की छवि बनाई है। सोनीपत में मजदूर, किसान, महिला, आशा, आंगनबाड़ी, मिड डे मील, कर्मचारी अथवा किसी वर्ग का कार्यक्रम हो वहाँ सिल्कराम की उपस्थिति अवश्य रहती है। वर्षों पहले उनसे परिचय हुआ और तभी से उन्हें गतिशील, विवेकपूर्ण और ऊर्जावान साथी के रूप में देखा है। यदि सोनीपत में कोई निजी या सामूहिक काम पड़े तो सबसे पहले उन्हीं पर नजर जाती है, क्योंकि वे भरोसेमंद और सकारात्मक दृष्टिकोण के व्यक्ति हैं।
24 सितंबर 1964 को तत्कालीन करनाल जिले (अब पानीपत) के बवाना लाखू गाँव में एक किसान परिवार में जन्मे सिल्कराम ने गाँव में और बाहर खास पहचान बनाई। उनकी पहचान बड़े पदों से नहीं, सदाचार, सादगी और सहयोगी स्वभाव के चलते बनी है। उनकी माँ श्रीमती सुखदेई और पिता श्री फूलसिंह खेती व पशुपालन से अपना परिवार चलाते थे। बहुत परिश्रमी और सबके काम आने वाले माता-पिता के गुण व संस्कार इन्हें भी सहज ही मिल गए। वे चार भाई और चार बहनों में सबसे छोटे हैं। सन् 1980 में दसवीं कक्षा पास करने के बाद 1984 में स्नातक डिग्री हासिल की।
वे 29 मई 1986 को जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में वर्क सुपरवाइजर पद पर नौकरी में आए और 30 सितंबर 2022 को इंस्पेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए। वे सन् 1986-87 के आन्दोलन में समर्थक के रूप में कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे थे। यह शुरुआती दौर था, न तो पर्याप्त अनुभव था और न ही पहचान बनी थी। सन् 1989 में जन विज्ञान जत्था चला और पानीपत को पूर्ण साक्षरता के लिए चुना गया तो यह उनके व्यक्तित्व में परिवर्तनकारी साबित हुआ। उन्हें इस अभियान में इसराना ब्लॉक का को-आर्डिनेटर बनाया गया। इस अभियान में आने का शुरुआती आकर्षण तो ड्यूटी फ्री रहकर घूमते-फिरते रहना था, लेकिन डॉक्टर आर.एस.दहिया, प्रोफेसर मनजीत राठी, डॉक्टर अशोक अरोड़ा, डॉक्टर शंकरलाल, उमेद सिंह नरवाल जैसे साथियों के सानिध्य में नए विचार अंकुरित होने लगे। धीरे-धीरे वे प्रगतिशील, समता, समानता, न्याय और मानवीय संवेदना से लैस नए व्यक्ति की तरह विकसित हो गए। इस नई सोच ने उन्हें कर्मचारी आन्दोलन में भी अग्रगामी सोच रखने वाले नेता के रूप में स्थापित कर दिया। गाँव में भी उनकी अलग पहचान बन गई। इसके प्रभाव से उनके भाई पंचायत के लिए चुने गए।
उन्हें सन् 1995 मैकेनिकल वर्करज यूनियन में राज्य स्तर पर उपाध्यक्ष चुना गया। उसके बाद यूनियन में विभाजन हो गया। उन्हें पुनः चौखानी धर्मशाला भिवानी में हुए सम्मेलन में उपाध्यक्ष बनाया गया। सन् 2001 में सोनीपत के इंडियन स्कूल में हुए सम्मेलन में महासचिव निर्वाचित किया गया। इसके बाद वे लगातार छह बार महासचिव रहे। उसके अलावा एक बार अध्यक्ष, दो बार वरिष्ठ उपाध्यक्ष, एक बार मुख्य संगठनकर्ता और एक बार महासचिव बनाया गया। वे सन् 1995-99 तक सोनीपत में सर्वकर्मचारी संघ के जिला सचिव भी रहे। सेवानिवृत्ति के समय वे संघ के राज्य उपाध्यक्ष थे। लम्बे समय तक किसी न किसी कार्यकारी भूमिका में रखना उनके टिकाऊपन और भरोसेमंद व्यक्तित्व का प्रभाव माना जा सकता है।
आन्दोलनों के चलते उन्हें अनेक बार उत्पीड़न की कार्रवाइयों को झेलना पड़ा। वे स्वभाव से शांत व धैर्य से स्थिति का सामना करने के अभ्यस्त रहे हैं। इसीलिए उत्पीड़न के समय अथवा पुलिस-प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति में भी वे विचलित नहीं होते। उन्हें सन् 1993 के आन्दोलन के गिरफ्तार किया गया और सात दिन जेल में रहे। उसके बाद उन्हें निलम्बित कर दिया गया। जब दिसम्बर 1993 हड़ताल शिखर पर पहुंची तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। ये कार्रवाइयां समझौता होने के बाद निरस्त हुईं। सन् 1996-97 के पालिका आन्दोलन में भी वे सक्रिय थे। सन् 1998 नर्सिंग आन्दोलन में नर्सों को संगठित करने में अहम् भूमिका निभाई और दिल्ली में हुए लाठीचार्ज में ये दमन का शिकार हुए। सन् 1998 में हिसार में चल रही सर्वकर्मचारी संघ की बैठक से सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उनमें सिल्कराम भी शामिल थे। चार दिन बाद हिसार जेल से रिहा किया गया। उसके अलावा हड़ताल के समय रोडवेज बस स्टैंड से अनेक बार हिरासत में लिया गया। वे अपने सेवाकाल में अखिल भारतीय व राज्य हड़ताल समेत सभी गतिविधियों में शामिल रहे हैं।
सेवानिवृत्ति के पश्चात् वे सीटू के जिला कोषाध्यक्ष हैं। हाल ही गोहाना रोड बाईपास पर 140 वर्गगज के प्लाट में सीटू कार्यालय का निर्माण किया जिसका उद्घाटन शहीद भगतसिंह के भांजे प्रोफेसर जगमोहन ने 23 मार्च 2026 को किया है। सिल्कराम को सभी संगठनों के लोग “अपना” मानते हैं। इसलिए उन्हें ज्ञान विज्ञान समिति व शहीद यादगार समिति ने सचिव, किसान सभा जिला कमेटी सदस्य, रिटायर्ड कर्मचारी संघ का उप-संयोजक बनाया गया है। वे सोनीपत और राज्य स्तर होने वाले सभी अभियानों में सक्रिय रहते हैं। अच्छे वक्ता होने के कारण उन्हें सब जगह सुना जाता है। साक्षरता अभियान से प्रेरित एवं दीक्षित होकर वे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी शरीक होते हैं।
वे मानते हैं कि सर्वकर्मचारी संघ के साथ यूनियन का आना बहुत अच्छा रहा है। संघ के आन्दोलनों ने विभागीय संघर्षों के लिए छतरी का काम किया है और उन्हें सफल बनाने में महती भूमिका निभाई है। उन्हें लगता है कि ईमानदारी सबसे बड़ा गुण है। नौकरी के शुरुआती दिनों में एक बार कमीशन में 700 ₹ राशि ले ली थी लेकिन वह गलती कभी नहीं दोहराई। आत्मसम्मान और गरिमामय जीवन आदर्श बन गया था।
आन्दोलन के दौरान अनेक बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों से परिचय हुआ। शायद संगठन में नहीं होते यह कभी नहीं होना था। डेलिगेशन में भजनलाल, ओमप्रकाश चौटाला, बंसीलाल, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, मनोहर लाल खट्टर आदि मुख्यमंत्रियों से बात करने का अनुभव हुआ। उनके अलावा किरण चौधरी, रणदीप सुरजेवाला, कैप्टन अजय सिंह यादव और बीरेन्द्र सिंह से भी मंत्री के रूप में वास्ता पड़ा। राजेश खुल्लर, अनिल मलिक, ए. के. सिंह, रोहतास खर्ब, अजीत बालाजी जोशी, पंकज अग्रवाल आदि आला अफसर उन्हें पहचानते रहे हैं। कभी किसी नेता या अधिकारी से निजी काम नहीं लिया लेकिन सामूहिक काम के लिए कभी संकोच नहीं किया।
वे आत्मावलोकन करते हुए बताते हैं कि ड्यूटी के प्रति समर्पण में कमी रही है जो अब महसूस होती है। संगठन में कुछ मौकों पर हमारे अपने साथियों को ही आगे रखने से फूट हुई। वे निजी तौर उससे बचना चाहते थे, लेकिन उच्च स्तर के परामर्श के बाद स्वीकार करते रहे। अब लगता है कि पद नहीं, एकता जरूरी थी। जीवन प्रगतिशील मूल्यों को अपनाया लेकिन शादी में परम्परागत परिवार मिला। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन के लिए जरूरी मानते हैं। सदाचार, संवेदनशीलता, नशे से दूर रहना और ईमानदारी के बिना सफलता नहीं मिलती। सिल्कराम ने जो माना उसे जीवन में उतारने का पूरा प्रयास किया।
आन्दोलन की मौजूदा स्थिति से वे थोड़ा अप्रसन्न हैं। पहले पैदल या साइकिलों पर चलते थे, अब कारों में। साथियों के घर रुकते थे, अब सैकड़ों किलोमीटर का सफर करके घर पहुंच जाते हैं। संगठन को कम समय दिया जाता है। सोशल मीडिया, मैसेज आदि का सहारा है, फील्ड में जाकर सीधा संपर्क छूट गया है। ब्याह-शादी में शानोशौकत व आडम्बर पर भारी खर्च करते हैं लेकिन संगठन के कुछ देने में संकोच करते हैं। मीटिंग के बाद निर्णयों को लागू करने का फॉलोअप नहीं है। यह स्थिति बदले बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। कर्मकांड और पाखंड का विस्तार हो रहा है। वे महसूस करते हैं कि समाज में जगह बनाने के लिए गीत-नाटक आदि के जरिए लोगों में जगह बनाने की आवश्यकता है। दफ्तरों में मीटिंग करने से अधिक जरूरत चौपालों में जाने की है।
कर्मचारी नेता अपने घरों में यथास्थिति को बदलने के पहल नहीं करते। बस परिवार वाले हमें न रोकें और घरेलू विषयों में पत्नी या बच्चों का अधिकार क्षेत्र मान लिया गया है। आन्दोलन में परिवार ने साथ दिया है। घर आए साथियों की आवभगत ठीक से हो जाती है। सिल्कराम का विवाह 14 जुलाई 1986 को सुश्री राजेश देवी के साथ हुआ। बेटा बी.एसी. केमेस्ट्री ऑनर्ज दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा है। उसने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से फाइनेंस में पढ़ाई की और अब यूको बैंक में सीनियर मैनेजर पद पर है। पुत्रवधु आईआईटी रूड़की से माइक्रोबायोलॉजी और साइकॉलजी में एम.एससी. है और भारत सरकार के उपक्रम सीडीसी में कार्यरत है। दो पोतियां हैं। बेटी दिल्ली में जूनियर साईंटिस्ट है। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक : सत्यपाल सिवाच

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