शाह रज़ा पहलवी की दावत ने एक पाकिस्तानी अभिनेत्री को आत्महत्या की कोशिश तक पहुँचाया
साकिब सलीम
जब शाह रज़ा पहलवी की दावत ने एक पाकिस्तानी अभिनेत्री को आत्महत्या की कोशिश तक पहुँचा दिया और इससे हबीब जालिब की बग़ावती नज़्म पैदा हुई, जिसका रिश्ता बाद में फ़िलिस्तीन से भी जुड़ा।
नीलो 1960 के दशक में पाकिस्तान की एक बेहद लोकप्रिय फ़िल्म अभिनेत्री थीं। उनका जन्म एक कैथोलिक परिवार में सिन्थिया अलेक्ज़ेंडर फ़र्नान्डिस के नाम से हुआ था। 1956 में उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में आते ही अपना स्क्रीन नाम नीलो रख लिया और 1965 तक वे पाकिस्तान की सबसे मशहूर अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं।
11 फ़रवरी 1965 को उन्हें उस वक़्त के पाकिस्तान के गवर्नर और राष्ट्रपति अयूब ख़ान के क़रीबी सहयोगी आमिर मोहम्मद ख़ान ने बुलाया। ईरान के शासक शाह रज़ा पहलवी के सम्मान में एक डिनर पार्टी रखी गई थी और नीलो से उसमें नृत्य करने को कहा गया।
लेकिन नीलो के विचार समाजवादी थे। उनका मानना था कि तानाशाहों और शासकों की निजी महफ़िलों में नाचना उनके उसूलों के ख़िलाफ़ है।
इसलिए उन्होंने उस दावत में प्रदर्शन करने से साफ़ इंकार कर दिया।
जैसा कि उम्मीद थी, यह बात गवर्नर को बेहद नागवार गुज़री। पुलिस भेजी गई और नीलो को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें ज़बरदस्ती उस पार्टी में लाया गया ताकि वे नृत्य करें।
इस अपमान और ज़िल्लत से टूटकर नीलो ने नींद की गोलियों की भारी मात्रा खा ली।
पुलिस ने जैसे ही उन्हें नाचने पर मजबूर किया, वे बेहोश होकर फ़र्श पर गिर पड़ीं।
डॉक्टरों को उन्हें बचाने में कई दिन लग गए।
तानाशाहों के सामने उनके इस साहसिक विरोध के अलावा पाकिस्तान की फ़िल्म इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया भी बेहद मज़बूत और एकजुट थी। फ़िल्मकारों ने नीलो के समर्थन में एक दिन की हड़ताल का ऐलान किया।
मशहूर मार्क्सवादी और प्रगतिशील शायर हबीब जालिब, जो फ़िल्मों के लिए भी लिखते थे, उन्हें अस्पताल में देखने जा रहे थे। रास्ते में ही उन्होंने एक बेहद ताक़तवर और बग़ावती नज़्म लिखी – “नीलो”।
वह नज़्म कुछ यूँ थी;
तू कि नावाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी
रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
तुझ को इंकार की जुरअत जो हुई तो क्यूँकर
साया-ए-शाह में इस तरह जिया जाता है
(तुम शाही हुकूमत के तौर-तरीक़ों से नावाक़िफ़ थीं!
ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है
तुम्हें इंकार करने की जुरअत कैसे हुई
बादशाह की छाया में ऐसे नहीं जिया जाता)
अह्ल-ए-सरवत की ये तजवीज़ है सरकश लड़की
तुझ को दरबार में कोड़ों से नचाया जाए
नाचते नाचते हो जाए जो पायल ख़ामोश
फिर न ता-ज़ीस्त तुझे होश में लाया जाए
(ऐ बाग़ी लड़की, अमीरों का ये फ़ैसला है
तुम्हें दरबार में कोड़ों की ताल पर नचाया जाए
और जब नाचते-नाचते तुम्हारी पायल ख़ामोश हो जाए
तो फिर ज़िंदगी भर तुम्हें होश में न लाया जाए)
लोग इस मंजर-ए-जांकााह को जब देखेंगे
और बढ़ जाएगा कुछ सतवत-ए-शाही का जलाल
तेरे अंजाम से हर शख़्स को इबरत होगी
सर उठाने का रिआया को न आएगा ख़याल
(जब लोग इस दिल दहला देने वाले मंज़र को देखेंगे
तो बादशाह की शान और बढ़ेगी
तुम्हारे अंजाम से हर शख़्स सबक लेगा
और प्रजा सिर उठाने की हिम्मत नहीं करेगी)
तब-ए-शाहाना पे जो लोग गिरां होते हैं
हाँ उन्हें ज़हर भरा जाम दिया जाता है
तू कि नावाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी
रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
(जो लोग शाही मिज़ाज को चुनौती देते हैं
उन्हें ज़हर से भरा जाम पिलाया जाता है
तुम शाही हुकूमत के तौर-तरीक़ों से नावाक़िफ़ थीं!
ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है)
लेकिन इस कहानी को अमर बनाने वाली असली श्रद्धांजलि अभी बाकी थी।
1969 में फ़िल्म “ज़रक़ा” रिलीज़ हुई।
इस फ़िल्म को एक और प्रगतिशील लेखक-निर्देशक रियाज़ शाहिद ने लिखा और निर्देशित किया था।
यह फ़िल्म यासिर अराफ़ात और उनके संगठन फ़तह की इस्राइल के ख़िलाफ़ लड़ाई से प्रेरित थी।
इस फ़िल्म में नीलो ने खुद मुख्य भूमिका निभाई – एक फ़िलिस्तीनी लड़की के रूप में।
नीलो की वास्तविक ज़िंदगी की इस लड़ाई को अमर बनाने के लिए रियाज़ शाहिद ने हबीब जालिब की इसी नज़्म को फ़िल्म में गीत के रूप में शामिल किया।
गीत का चित्रण पूरी तरह असल घटना से प्रेरित था।
फ़िल्म में नीलो एक फ़िलिस्तीनी लड़की के किरदार में होती हैं, जिसे ज़ंजीरों में जकड़कर नाचने के लिए मजबूर किया जाता है।
सीन में दिखाया जाता है कि उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। जैसे ही वह दर्द से चीखती है, उसका एक साथी जिसे एजाज़ दुर्रानी ने निभाया। यह गीत गाना शुरू कर देता है।
हबीब जालिब की नज़्म में थोड़े बदलाव करके इसे गीत बनाया गया।
इसे महान गायक मेहदी हसन ने गाया और संगीत रशीद अत्तरे ने दिया।
सबसे बड़ा बदलाव गीत की शुरुआती पंक्तियों में था।
जहाँ मूल नज़्म में था;
तू कि नावाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी
रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
(तुम शाही हुकूमत के तौर-तरीक़ों से नावाक़िफ़ थीं
ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है)
उसे बदलकर कर दिया गया;
तू कि नावाक़िफ़-ए-आदाब-ए-गुलामी है अभी
रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
(तुम अभी गुलामी के तौर-तरीक़ों से नावाक़िफ़ हो
ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है)
यह फ़िल्म सिर्फ़ फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा ही नहीं दिखाती, बल्कि इस गीत के ज़रिए अपने ही समाज की हालत पर भी इशारा करती है।
यह पाकिस्तान के कलाकारों की तरफ़ से अपने तानाशाह शासकों को दिया गया एक सशक्त जवाब था कि कला झुकती नहीं।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि आज हमारे कलाकारों की तरफ़ से ऐसी प्रतिरोध की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती – कम से कम लोकप्रिय सिनेमा में तो नहीं।
नई पीढ़ी के लिए एक दिलचस्प बात नीलो, पाकिस्तानी फ़िल्म स्टार शान की माँ हैं।
