विज्ञान और आस्था 

विज्ञान और आस्था

ओमप्रकाश तिवारी

क्या आम आदमी का सोच अवैज्ञानिक है? उसको विज्ञान पर भरोसा नहीं है? वह विज्ञान को ग़लत मानता है? आस्था से ही संचालित होता है? उसकी चेतना वैज्ञानिक नजरिये से नहीं संचालित होती है? इन सब सवालों का एक ही जवाब है कि ऐसा नहीं है।

गौहर रज़ा अपनी किताब मिथकों से विज्ञान तक में लिखते हैं कि इलाहाबाद में होने वाले कुंभ मेले के दौरान लगातार तीस वर्षों तक किए जाने वाले एक सर्वे के अनुसार जब यह पूछा गया कि आप विज्ञान को उन्नति का रास्ता मानते हैं या विनाश का, तो 75 फीसदी लोगों का मानना था कि उन्नति का और केवल 3.8 ने कहा कि विनाश का।

इसी तरह जब यह पूछा गया कि आप वैज्ञानिकों को आदर की नज़र से देखते हैं या घृणा की? जवाब में 74.5 फीसदी लोगों का कहना था कि सम्मान की नज़र से देखते हैं। केवल 1.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि घृणा से देखते हैं। गौहर रज़ा लिखते हैं कि यह सर्वेक्षण यह भी बताता है कि आम आदमी का वैज्ञानिक जानकारी का स्तर लगातार बढ़ रहा है।

फिर यह सवाल उठता है कि फिर समाज के अधिकतर लोगों में किसी मान्यता, परंपरा और मिथक को लेकर कट्टरता क्यों दिखाई देती है? अक्सर आस्था भावुकता की चादर ओढ़कर वैज्ञानिक चेतना को ढंक क्यों देती है?

एक कुत्ता धर्म स्थल की परिक्रमा करने लगे तो लोग उस कुत्ते को ही पूजने लगते हैं। चढ़ावा चढ़ाने लगते हैं। नई गाड़ी खरीदने पर सबसे पहले धर्मस्थल पर ही क्यों जाते हैं? ऐसे उनकी वैज्ञानिक चेतना कहां तिरोहित हो जाती है?

मनोविज्ञान कहता है कि धर्म के नाम पर बचपन से जो संस्कार दिए जाते हैं वह हमेशा चेतना पर प्रभावी रहते हैं। अनिष्ट की आशंका का डर इतना ज्यादा प्रभावी होता है कि आदमी किसी भी रहस्य, चमत्कार और असामान्य घटना या स्थिति को जिसे वह समझ नहीं पाता आस्था से प्रभावी होकर स्वीकार कर लेता है।

इसके बाद उसका व्यवहार अवैज्ञानिक हो जाता है। उसकी चेतना पर अनिष्ट का डर इतना प्रभावी हो जाता है कि वह तर्क करना बंद कर देती है। सवाल या परख की वैज्ञानिक विधि का त्याग कर देती है।

हालांकि इसी बीच कुछ लोगों की वैज्ञानिक चेतना काम करती है। ऐसे लोग तर्क करते हैं। सवाल करते हैं तो सत्य का अनुसंधान भी हो जाता है। हालांकि तब तक आस्था अपना खेल कर चुकी होती है।

कुत्ता के परिक्रमा करने वाले प्रसंग में दो दिन बाद डॉक्टर की इंट्री होती है। पहले कुत्ते को स्वस्थ बताया जाता है लेकिन मानसिक रूप से बीमार होने की बात कही जाती है। दूसरे डॉक्टर ने देखा तो कुत्ते में इंफेक्शन मिला। इलाज किया गया तो कुत्ता खाने पीने लगा। आराम भी करने लगा। फिर भी परिक्रमा करता।

अब उसका इलाज दिल्ली में एक बड़े निजी अस्पताल में चल रहा है। सिर की एमआरआई होने के बाद उसकी मानसिक बीमारी का पता चल सकता है।

अब जो कुत्ते के इलाज की प्रक्रिया चल रही है यही है वैज्ञानिक दृष्टिकोण। मंदिर जो भंडारा चल रहा है और कुत्ते की पूजा जो की जा रही है यह है आस्था जो कि अनिष्ठ की आशंका से संचालित होती है।

 

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