हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-82
रोहिताश्व पूनिया -प्रबुद्ध और समर्पित शिक्षा
सत्यपाल सिवाच
कुरुक्षेत्र जिले के लाडवा खण्ड के गांव बन में श्रीमती चलती देवी और श्री कुलवंत सिंह के घर दिनांक 5 अक्तूबर 1959 को एक सपूत ने जन्म लिया। नाम रखा गया – रोहिताश्व। शायद तब जन्म देने वाली माँ ने सोचा भी नहीं होगा कि उनका लाल एक परिवार के साथ समाज में भी अपने सुकृत्यों, प्रबुद्धता और सामाजिकता की ऊंची मिसाल कायम करेगा। नाम, शक्ल-सूरत से तो वे सब जैसे साधारण व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं लेकिन जब भी कोई उनके संपर्क में आ जाता है तो उस पर ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं कि उन्हें वह भुला नहीं सकता है। मेरा और उनका संपर्क भी यूं ही अध्यापक संघ के कार्यकर्ता ढूंढते-ढूंढते हुआ था, शिवराम मथाना के माध्यम से। शायद वे उन दिनों पिपली में कार्यरत थे। उसके बाद वर्षों तक उनकी ऐसी अमिट छाप पड़ी कि किसी विषय कोई सुझाव देते तो उसे नजरअंदाज करना संभव नहीं होता।
वे साधारण किसान परिवार में पले-बढ़े। किसान पृष्ठभूमि की सहज उदारता और दूसरों को साथ ले चलने की सोच उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रही। मुझे नहीं लगता कि एक बार मित्र बनकर कोई उनसे दूर हो पाया। किसी वजह से ऐसा हुआ भी होगा तो उन्हें पछतावा जरूर रहा होगा। वे चार भाई-बहन हैं। उन्होंने सन् 1978 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड से दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण की, गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से ‘विद्यारत्न’ 1975 में, पंजाब विश्वविद्यालय से 1977 में ‘शास्त्री’, हरियाणा शिक्षा विभाग सन् 1979 में ओ टी, एम.डी.यू. रोहतक 1992 में बी ए और 1994 में एमए (संस्कृत) उपाधि प्राप्त की। सन् 1995 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से बीएड उपाधि ली। शिक्षा यात्रा भी उनकी लग्न को दर्शाती है।
विद्यालय शिक्षा गुरुकुल कुरुक्षेत्र से, शास्त्री गुरुकुल मटिंडू से, मैट्रिक प्राइवेट और ओटी संस्कृत महाविद्यालय चरखी दादरी से की। शेष उपाधियां सेवारत रहते हुए ग्रहण की। रोहिताश्व 26 मार्च 1980 को संस्कृत अध्यापक के रूप में शिक्षा विभाग में आए। शैक्षिक योग्यता के आधार वे संस्कृत के प्राध्यापक, उच्च विद्यालय के मुख्याध्यापक और सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पदों पर पदोन्नत हुए तथा 31 अक्तूबर 2017 को सेवानिवृत्त हुए।
हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में सक्रिय होने की उनकी कहानी भी रोचक है। वे अपनी मूल प्रकृति से स्वाध्याय और अध्यापन में प्रवृत्त रहने वाले हैं। जब अध्यापक संघ में व्यक्तिवादी कार्यप्रणाली के विरुद्ध विद्रोह हुआ तो हम कुरुक्षेत्र में प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं की तलाश में थे। कामरेड पृथ्वीसिंह गोरखपुरिया के माध्यम से शिवराम जी से मुलाकात हुई। उन्होंने रोहित के बारे में बताया। जब इनसे बात की तो इस आधार पर सक्रिय हो गए कि अच्छे उद्देश्य के लिए योगदान देना चाहिए। बाद में जब हिन्दी मासिक “अध्यापक समाज” का प्रकाशन कुरुक्षेत्र से होने लगा तो इन्होंने बहुत रचनात्मक ढंग से उस काम को अंजाम दिया। वे अध्यापक संघ में खण्ड सचिव, जिला प्रचार-सचिव और सर्वकर्मचारी संघ में जिला कोषाध्यक्ष रहे। उन्होंने 1990 से 2010 तक बीस वर्ष, पत्रिका के संपादक मंडल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें अध्यापक संघ, सर्वकर्मचारी संघ और प्रगतिशील जनवादी आन्दोलन में काम करने के अनुभवों पर गर्व है। वे आन्दोलन में काम करते हुए सत्यपाल सिवाच के नेतृत्व से प्रभावित रहे ; यूनियन का अध्यापकों के हितों के लिए ही काम करना उनके लिए प्रेरणास्रोत बना और संगठन के मंच से अच्छे और सच्चे साथियों से मिलना, सीखना और प्रेरणा लेना भी उन्हें यूनियन में काम करने के लिए उत्साहित करता रहा। वे सन् 1985 से सेवानिवृत्त होने तक सभी संघर्षों में शामिल रहे। केवल हड़ताल अवधि के लिए विशेष अवकाश लेने के अलावा कोई उत्पीड़न शेष नहीं रहा।
कोई समृद्ध परिवार तो था नहीं इसलिए निश्चित तौर पर परिवार को परेशानी उठानी पड़ती थी। उनकी जीवन साथी कुलदीप कौर से बहुत अच्छे मित्रों सी ट्युनिंग रही है। दोनों ही एक दूसरे के समझ का सम्मान करते हैं। इसलिए यूनियन में समय का परिवार पर जो बोझ पड़ता उसे सहर्ष वहन करते रहे। बच्चे उस दौर में छोटे थे।
उनकी शिक्षा-दीक्षा भी दोनों मिल-बांटकर चलाते रहे। नेताओं और अधिकारियों से कभी जुड़ने की कोशिश नहीं की। स्वाभिमानी प्रकृति के चलते किसी की अनावश्यक चिरौरी करना उनके लिए संभव नहीं था। यूं शिक्षा विभाग कुरुक्षेत्र में आए अधिकारी तो उन्हें कर्तव्यपरायणता के कारण स्वतः महत्व देते थे। उन्हें लगता है कि पहले की तुलना आज के हालात बहुत बदल गए हैं। आज तानाशाही का दौर है, जिसके कारण भय का वातावरण बना हुआ है।
रोहित और कुलदीप कौर का विवाह मई 1981 में हुआ था। वे दोनों कैनेडा के स्थायी निवासी हैं। साल में एक-दो बार अपने पैतृक गांव में आते रहते हैं। छोटे भाई रणपाल का परिवार गांव में ही रहता है। दो बेटे हैं। बड़ा न्यूजीलैंड में ट्रक चलाता है और छोटा कैनेडा में टेलिकॉम सुपरवाइजर है। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
