अदनान कफील दरवेश के कविता संग्रह लानत का प्याला की समीक्षा
आश्वस्ति जगाती कविताएं
अंकित नरवाल
ऐसे समय में जब शब्द सबसे ज्यादा संदिग्ध स्थिति में पहुँचा दिए गए हों। साहित्य और राजनीति एक दूसरे से कदमताल मिला कर किसी भव्य समारोह की तैयारियों में जुटे हों और आम आदमी की शिकायतों के लिए बाहर ‘प्रवेश निषेध’ का बैनर लगा दिया गया हो; इतिहास के उत्खनन में साहित्य स्तुति में और कवि चारण व कथावाचक की भूमिका में ढल आराम तलाशने में मशगूल हों, अदनान कफ़ील दरवेश का ताजातरीन कविता संग्रह ‘लानत का प्याला’ पढ़ कर एक गहरी आशा जगती है। यह आश्वस्ति दोहरी भूमिका लेकर उपस्थित होती है- एक फासिस्ट के प्रतिरोध की लेखकीय ईमानदारी के प्रति और दूसरी स्वयं कविता के प्रति।
यहाँ यह लानत का प्याला कवि जिसके लिए लाया है – वह कोई दूर की दुनिया का अधिनायकवादी विश्वगुरु नहीं है, बल्कि स्वयं उसके पीछे लहालोट होने वाला आम आदमी है। यह पहचान को संदिग्ध बनाए जाने का वह दौर है, जिसमें हर व्यक्ति एक रंग और धर्म में रिड्यूज हो गया है। इस पहचान की आपाधापी में आपसदारी का लंबा इतिहास सबसे कमजोर स्थिति में पहुँच गया है। देश के विकास में किन्हीं ‘कब्रों’ को अड़चनों की तरह पेश किया जा रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियाँ बढ़ रही हैं और आम आदमी की साँसें कम होती जा रही हैं। ऐसी स्थिति में सबसे हास्यास्पद लगता है- सत्ता के साथ एक ही मंच पर बैठकर बातचीत के लिए लालायित जनकवि को देखना। लेकिन अदनान का कवि मन ऐसे समय में जिस प्रतिरोध का मुहावरा तलाश रहा है – वह है यह लानत का प्याला –
जब कभी ये नौबत आन पड़े
कि एक फ़ाशिस्ट के साथ
चाय की मेज पर
साथ बैठना पड़ जाए
और ऐन मुमकिन है कि उसी वक़्त
बुजदिली
या रवादारी
या तहजीब
या कि दुनियादारी
उसूलों के आड़े आ जाएँ
तो और कुछ भले न कर सकूँ
लेकिन इतना तो कर ही सकता हूँ
कि अपने ऊपर
वह लानत का गरम प्याला उड़ेल लूँ…
अदनान की कविताएँ में दबी-सहमी मनुष्यता के जितने शेड हैं, उनके पीछे हँसता हुआ फासिस्ट चेहरा आसानी से पहचाना जा सकता है। वह अबकी किसी दरवेश की वेशभूषा में नहीं आया है, बल्कि उसने साफ-साफ क़ातिल की शक्ल इख्तियार की है और लोग अब उसी के दीवाने हुए जा रहे हैं। यह सबसे बड़ा आत्मघाती समय है। यह सबसे शर्मनाक समय है – जिसमें कविता तक अपने लिखने वालों के प्रति लानतें भेज रही हैं। लेकिन कवि ने इस सत्ता के मुँह लगे ख़ून को पहचान लिया है, तभी वह कह सका है कि-
हमारी मिज़ाजपुर्सी को आए आप
हमारे ख़ून से सना
अपना मुँह तो पोंछ लिया होता।
ऐसे मनुष्यता विरोधी समय में कवि की अपनी कविता के प्रति उम्मीद क़ायम है। वह समय के झाड़-झंखाड़ को जिस आपसी सौहार्द के बेलचों से उखड़ा फेंकना चाहता है, वह आपसदारी से निर्मित होगा। वहाँ हिन्दू-मुसलमान दो ध्रुवों की तरह नहीं, बल्कि एक मोहल्ले के दो सहकर्मियों की तरह महसूस करेंगे। यह सबसे अच्छी कविता की उम्मीद है- सबसे अच्छी दुनिया की निर्मिति के लिए-
अकेले-अकेले तो नहीं उगेगा
हमारी आँखों में एक-सा चमकता
अनचीन्हा वह
नाली फूल
प्रतिरोध के ईमानदार अन्वेषण के प्रति उम्मीद इस संग्रह का स्थायी मुहावरा है और अदनान की कविता में उतरने का मुख्य दरवाज़ा भी। आइये इस दरवाज़े से प्रवेश करें – दूसरी ओर की महफ़ूज़ दुनिया में। अंकित नरवाल के फेसबुक वॉल से साभार

समीक्षक- अंकित नरवाल
