श्रृंखला 4
रहबर-ए-आजम, सर छोटू राम: सैन्य रणनीतिकार के रूप में
डॉ. रामजीलाल
भारत का इतिहास पढ़ने के बाद यह ज्ञात होता है कि जाटों का इतिहास एक शासक और सैनिक वर्ग का इतिहास रहा है. उदाहरण के लिए, हिंदू जाट राजाओं में, महाराजा सूरज मल को महत्वपूर्ण और गौरवशाली अध्याय माना जाता है. महाराजा सूरज मल भरतपुर के शासक थे. एक समकालीन इतिहासकार उन्हें ‘जाट लोगों का प्लेटो’ और आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार वे ‘जाट यूलिसिस’ – दूरदर्शी शासक थे .भारत के इतिहास प्रमुख वास्तविक नायक – सूरज – (सूर्य) सर्वोच्च शासकों की आकाशगंगा में “सूर्य” की तरह चमक रहे हैं. रोहिल्ला और रामपुर राज्यों के शासक मुस्लिम जाट राजा थे. सिख धर्म के सबसे शक्तिशाली शासक महाराजा रणजीत सिंह थे. जाट रियासतों की सुरक्षा और विस्तार में जाट सैनिकों ने एक अनोखी भूमिका निभाई.
मार्शल रेस थ्योरी: फूट डालो और राज करो की नीति:
‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाते हुए, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने धर्म, जाति और क्षेत्र का फायदा उठाया, क्योंकि उन्होंने एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ, एक धार्मिक समूह को दूसरे धार्मिक समूह के खिलाफ, और एक क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र के लोगों के खिलाफ दबाने के लिए सेनाएँ बनाई. पहला मिलिशिया रेजिमेंट 10 जुलाई, 1795 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता में अपनी छावनी की रक्षा करने और अपने शासन का विस्तार करने के लिए स्थापित किया था. बाद में, इस रेजिमेंट या इन्फैंट्री की शाखाएँ स्थापित की गईं. पहली बटालियन – 22वीं बंगाल बटालियन – 1803 में बनी, दूसरी 1817 में, और तीसरी 1823 में. ब्रिटिश सैन्य अधिकारी पढ़े-लिखे या अनपढ़ शहरी युवाओं को ‘कायर’ और सशस्त्र बलों के लिए ‘अयोग्य’ मानते थे. इसके बजाय, वे ग्रामीण, अनपढ़ और हट्टे-कट्टे नौजवानों को पसंद करते थे, उन्हें सैन्य सेवा के लिए ‘आदर्श’ मानते थे. नतीजतन, उन्होंने उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में जाट समुदाय के युवाओं को बंगाल सेना की सभी शाखाओं में भर्ती करना शुरू कर दिया, क्योंकि वे उन्हें युद्ध में ‘बहादुर और कुशल’ मानते थे.
इसी पॉलिसी को जारी रखते हुए, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजपूतों और गोरखाओं को भी अपनी सर्विस में भर्ती करने को प्राथमिकता दी. ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि इससे ब्रिटिश कंपनी के प्रति नई वफ़ादारी पैदा होगी. इस बंटवारे को और आगे बढ़ाते हुए, उन्होंने जातियों को एक ‘हायरार्किकल सिस्टम ‘में बांटा, जिसे आगे “मार्शल रेस” (मार्शल कौम) और “नॉन मार्शल रेस” (नॉन मार्शल कौम) में बांटा गया. इसका साफ मतलब था कि समाज का एक हिस्सा सेना के लिए ‘एलिजिबल’ हो गया और ज़्यादातर हिस्सा ‘इनएलिजिबल’ हो गया. इससे किसान आंदोलनों सहित क्षेत्रीय विद्रोहों को दबाने की उम्मीद थी.
1857 के लोकप्रिय विद्रोह ने यह साफ कर दिया कि जहां ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की ‘मार्शल रेस’ लोगों पर कहर बरपा रही थी, वहीं जींद के शासक, पटियाला के महाराजा और करनाल और कुंजपुरा के नवाबों की सेनाएं करनाल जिले के लोगों को दबाने में मदद कर रही थीं. एक तरफ, कुछ राजपूत राजा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ दे रहे थे और दूसरी तरफ, झज्जर और फर्रुखनगर के नवाबों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ क्रांति में सबसे आगे रहने के लिए फांसी दे दी गई थी. इसी तरह, जींद नरेश सरूप सिंह (जाट) ने 1857 में करनाल जिले में लोगों की क्रांति को कुचलने के लिए सेना भेजी. दूसरी ओर, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह (जाट) को विद्रोह के कारण 9 जनवरी 1858 को फांसी दे दी गई.
सन् 1857 की जनक्रांति के पश्चात, ज़्यादा जाटों को भारतीय ब्रिटिश सेना में भर्ती करने और उनकी वफ़ादारी जीतने के लिए “मार्शल रेस” और “बहादुर समुदाय” जैसे शब्दों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया गया .इसका नतीजा यह हुआ कि जाट समुदाय के युवाओं की सेना में भर्ती बढ़ने लगी और कई गांवों में सेना में भर्ती होने के लिए अलग-अलग गोत्रों के बीच मुकाबला होने लगा. उदाहरण के लिए, सोनीपत के आस-पास के गांवों में ‘दहिया’ और ‘मलिक गोत्रों’ के बीच सेना में भर्ती होने के लिए मुकाबला देखने को मिलने लगा. . इसी नीति को जारी रखते हुए, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजपूतों और गोरखाओं को भी अपनी सेवा में भर्ती करने में प्राथमिकता दी.
रहबर-ए-आजम, दीनबंधु, सर छोटू राम: सैन्य रणनीतिकार के रूप में
उस समय, जाटों समेत खेती करने वाले समुदायों का मुख्य काम खेती था और सिंचाई के साधनों की कमी और बारिश पर पूरी तरह निर्भर होने के कारण, खेती योग्य ज़मीन बंजर और कम उपजाऊ थी. ऐसे में, किसानों की आर्थिक हालत बहुत कमज़ोर थी और परिवार का गुज़ारा करना मुश्किल था.
सन् 1901 में, पंजाब में कुल कृषि ऋण 100 करोड़ रुपये था, जो 1921 में बढ़कर 200 करोड़ रुपये हो गया। नतीजतन, सन् 1923 में, पंजाब के 80 प्रतिशत किसान कर्ज में थे. कृषि ऋण के परिणामस्वरूप, 1901 में, 43.5 लाख पक्के बीघा ज़मीन साहूकारों के कब्ज़े में थी. उदाहरण के लिए, रोहतक-जाट क्षेत्र में स्थिति बहुत खराब थी. यह इस बात से स्पष्ट है कि रोहतक में 53,590 एकड़ ज़मीन कर्ज के बदले बेच दी गई थी, और 1,49,823 एकड़ ज़मीन 4,80,567 रुपये में साहूकारों के पास कब्जे सहित गिरवी थी. (डॉ. अनिल दलाल, प्रशासनिक सुधारक: चौधरी छोटू राम, अर्थ विजन पब्लिकेशन्स, गुरुग्राम ,2017, पृ.85). दूसरे शब्दों में, जाटों के गढ़ में बड़ी संख्या में जाटों के पास ज़मीन नहीं थी. उस समय के समाज में, किसानों का शोषण होता था क्योंकि साहूकार बहुत ज़्यादा ब्याज दर (18-36 प्रतिशत तक) वसूलते थे, इसलिए किसान कर्ज़ के जाल में फँस जाते थे और कर्ज़ चुकाने में असमर्थ थे. किसान कर्ज़ के जाल में फँस जाते थे.कर्ज़ चुकाने में असमर्थता के कारण, किसानों का शोषण साहूकारों, सूदखोरों और ज़मींदारों द्वारा किया जाता था. उनकी ज़मीन ज़ब्त कर ली जाती थी, और उनके पशुधन और आय के स्रोतों की नीलामी कर दी जाती थी। ऐसी स्थिति में, किसान कर्ज़ के बोझ तले दब जाता है, और यह कर्ज़ पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है.
आर्थिक हालत और कर्ज में दबे होने कारण किसानों की दयानीय स्थिति , का दीनबंधु सर छोटू राम की चिंतन पर गहरा असर पड़ा और उन्होंने सोचा कि किसान इस स्थिति से कैसे उबर सकते हैं.
हालांकि सर छोटू राम के पास कोई ऑफिशियल मिलिट्री कमांड नहीं थी, फिर भी उन्होंने खेती-बाड़ी करने वाले समुदायों को संगठित करने और उन्हें राजनीतिक और आर्थिक रूप से ताकतवर बनाने के लिए एक ‘परिष्कृत और बहुआयामी’ सैन्य रणनीति बनाई. इस नीति के अनुसार ओर किसान वर्ग को ‘वीर वर्ग’ और दूसरी ओर उनकी ‘खेत जोतने वाले वर्ग’ की भूमिका पर बल दिया. सर छोटू राम की किसी से कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं थी, लेकिन “चक्र वृद्धि ब्याज'(कंपाउंड इंटरेस्ट’) के सिस्टम को किसानों का सबसे बड़ा दुश्मन मानते हुए, उन्होंने किसानों की भलाई के लिए, साहूकारों और सूदखोरों की लूटपाट खत्म करने के लिए यूनाइटेड पंजाब में लैंड रिफॉर्म कानून और कर्ज़ माफी कानून बनाए. अपनी खेती के कानूनों के ज़रिए, सर छोटू राम पेशावर से दिल्ली तक किसान समुदायों के बीच हिंदू-मुस्लिम-सिख एकता के एक बेमिसाल व अतुलनीय नेता बन गए. इस रणनीति से किसानों को प्रेरित करते हुए, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वे सिर्फ़ खेती पर निर्भर रहकर अपना सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक विकास हासिल नहीं कर सकते. अपनी स्ट्रेटेजी समझाते हुए, उन्होंने किसानों से अपने दिल और दिमाग में ‘आत्मविश्वास, हिम्मत और आत्म-सम्मान’ बढ़ाने की अपील की। किसान समुदायों के लिए खेती के अलावा दूसरे काम करना और आर्थिक मज़बूती और भलाई के लिए सेना में शामिल होना बहुत ज़रूरी है.
इसीलिए सर छोटू राम ने जाट गज़ट , द ट्रिब्यून (लाहौर) और दूसरे न्यूज़ पेपर्स में आर्टिकल, कविताएँ, भाषण, भजन छपवाए ताकि किसान समुदायों के युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा सके. इसके अलावा, आर्य समाज, जाट संगठन, ज़मींदारा लीग, नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी और दूसरे फोरम का भी इस्तेमाल किसान समुदायों के युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करने के लिए किया गया. संक्षेप में, वह लघु संकीर्णताओं-जाति और धार्मिक वफ़ादारी से बहुत ऊपर थे और उनका एकमात्र मकसद जाति और धर्म की परवाह किए बिना सभी खेती करने वाले समुदायों के किसानों को ‘आर्थिक सशक्तिकरण’ करना था. किसानों को लामबंद करने के लिए सर छोटू राम ने पेशावर से गुड़गांव तक ‘ब्लिट्जक्रीग’( बिजली की गति से युद्ध) अभियान चलाकर ऊर्जावान करने का प्रयास किया.उनकी रणनीति नेशनल यूनियननिष्ट पार्टी के संकल्प हिंदू -मुस्लिम-सिख एकता पर आधारित थी.
प्रथम विश्व युद्ध (सन् 1914 – सन् 1918):
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, सर छोटू राम ने किसान जातियों के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए लामबंद किया . परिणाम स्वरूप प्रथम विश्व युद्ध में 4 अगस्त 1914 से 30 नवम्बर 1918 में हरियाणा क्षेत्र से 79932 सैनिकों की भर्ती हुई.4 अगस्त 1914 से 30 नवम्बर 1918 तक जिलेवार जो भर्ती हुए सैनिकों की संख्या निम्नलिखित है:
- जिला हिसार ( 15461)
- जिला रोहतक ( 22144)
- जिला गुड़गांव: (18867)
- जिला करनाल: (6553)
- जिला अम्बाला: ( 8341)
- देशी राज्य: ( 8566)
कुल जोड़: 79932
सैनिकों अतिरिक्त गैर-सैनिक (नॉन-कॉम्बैटेंट-फॉलोअर) बेकर, लोहार, कसाई, बढ़ई, रसोइया,मोची,सफाई कर्मी, दर्जी, धोबी, इत्यादि की सेना में की भर्ती भी हुई
प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने भारतीय जनता से चंदा स्वैच्छिक तथा बलपूर्वक भी लिया. हरियाणा क्षेत्र के द्वारा युद्ध में 84 लाख 33 हजार 666₹ वार फंड के रूप में दिए गए. इनमें करनाल जिले का योगदान 24,45,226 रुपए था.स्वैच्छिक चंदा देने वाले हरियाणवी प्रमुख नेता – रोहतक के चौ० लालचन्द (रोहतक), सर छोटूराम (रोहतक), चौ०छाजूराम (अलखपुरा-1,40,000 रुपये), चौ० शेरसिंह (हांसी1,35,000 रुपये), पं० प्रभुदयाल(गुड़गांव); राव बलवीर सिंह (गुड़गांव); तथा चौ ० लाजपतराय, ( हिसार) सेठ सुखलाल( हिसार), चौ० बंसगोपाल( हिसार) तथा पंडित जानकीप्रसाद( हिसार) थे.
द्वितीय विश्व युद्ध (सन्1939 सन्1945) :
द्वितीय विश्व युद्ध (सन्1939 -सन्1945) के दौरान सर छोटू राम ने युवाओं को आर्मी में भर्ती होने के लिए बढ़ावा देकर और फंड जमा करके युद्ध की कोशिशों को समर्थित करना जारी रखा. भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा उनके युद्ध अभियान की कड़ी आलोचना भी उनके रास्ते को रोक नहीं सकी. उनका मानना था कि ब्रिटिश युद्ध की कोशिशों मे सहायता करने से अंतत: भारतीय ग्रामीण समुदायों और किसानों को फायदा होगा. सर छोटूराम की यह मुहिम अंतिम सांस लेने तक निरंतर जारी रही .
बहुत ज़िद्दी व्यक्ति:
य़दि उन्होंने एक ओर युद्ध की कोशिशों का समर्थन किया, तो दूसरी तरफ़ उन्होंने किसानों के हितों की भी रक्षा की, और उनकी उपज के लिए सही दाम और मुआवज़े की वकालत की. हम अपने पाठकों को एक ज़रूरी सत्य घटना से परिचित कराना चाहते हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, सन्1942 में,भारत के वायसराय लॉर्ड वेवल ने एक मीटिंग की जिसमें सर छोटू राम मौजूद थे. लॉर्ड वेवल ने गेहूं का दाम सिर्फ़ ₹6 प्रति मण घोषित करने पर ज़ोर दिया.सर छोटू राम ने वायसराय को चेतावनी दी कि किसान ₹10 प्रति मण से कम रेट पर गेहूं नहीं बेचेंगे. लेकिन, वायसराय अपनी बात पर अड़े रहे. सर छोटू राम यह चेतावनी देते हुए मीटिंग से चले गए कि अगर दाम ₹10 प्रति मण से कम हुआ, तो पंजाब के किसान खड़ी गेहूं की फसल में आग लगा देंगे. घबराकर, लॉर्ड वेवेल ने सर छोटू राम को मनाने के लिए पंजाब के तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर सर सिकंदर हयात खान से सम्पर्क किया. लेकिन, सर सिकंदर हयात खान ने लॉर्ड वेवल को सलाह दी कि सर छोटू राम बहुत ज़िद्दी व्यक्ति हैं. उनके लिए यही अच्छा होगा कि उन्हें इज्ज़त के साथ वापस बुलाया जाए और समझौता किया जाए.
वायसराय लॉर्ड वेवल को सर छोटू राम को फिर से बुलाना पड़ा और वे 10 रुपये प्रति मण देने के लिए मान गए. लेकिन सर छोटू राम ने कहा कि अब किसान उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं क्योंकि वे 11 रुपये प्रति मण से कम पर गेहूं बेचने को तैयार नहीं हैं. आखिरकार वायसराय लॉर्ड वेवल को झुकना पड़ा और उन्हें 11 रुपये प्रति मण गेहूं का रेट देना पड़ा. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी किसानों के हितों की रक्षा करने के कारण वे मुस्लिम किसानों के खुदा(भगवान), जाट किसानों के ‘छोटे राम’ और गैर-जाट किसानों के ‘जाट देवता’ बन गए.
हरियाणवी सैनिक, जो अक्सर ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवारत होते थे—विशेष रूप से जाट रेजिमेंट, 13वीं फ्रंटियर फोर्स राइफल्स और विभिन्न राजपूत रेजिमेंट जैसी इकाइयों में— दोनों विश्व युद्धों और 19वीं और 20वीं शताब्दी के आरंभिक अभियानों के दौरानकम से कम 15 से 20 विभिन्न देशों और क्षेत्रोंमें अंग्रेजों के लिए लड़े. एक अनुमान के अनुसार, दो शताब्दियों में विभिन्न युद्धों में हरियाणा क्षेत्र के लगभग 1.8 लाख (180,000) निवासियों ने सर्वोच्च बलिदान दिया. यद्यपि प्रारंभ में ब्रिटिश सेना में हरियाणवी युवा एक सैनिक के तौर पर भर्ती हुए थे.
स्वतंत्रता प्राप्ति (1947)के पश्चात:
स्वतंत्रता प्राप्ति (1947)के पश्चात जाट सैनिकों और अधिकारियों ने भारत-पाक युद्ध(जम्मू-कश्मीर 1948, 1965 , 1971 और कारगिल युद्ध 1999) ,तथा भारत -चीन युद्ध (1962 )में जो कुर्बानियां दी वें भारतीय इतिहास के स्वर्णीम पृष्ठ हैं.इसके अलावा, जाट रेजिमेंट ने भारत के आतंकवाद प्रभावित इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ अंदरूनी शांति स्थापित करने और कई देशों में संयुक्त राष्ट्र (The United Nations)के शांति अभियानों में विशेष भूमिका निभाई है.
अपने 200 साल के सर्विस इतिहास में, जाट रेजिमेंट ने बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं. सैनिकों और अधिकारियों को ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार के साथ-साथ आज़ादी के बाद के समय में भारत सरकार ने भी सम्मानित है. जाट रेजिमेंट, भारतीय सेना की एक पैदल सेना रेजिमेंट है जिसने 1839 और 1947 के बीच 19 युद्ध सम्मान जीते हैं. स्वतंत्रता के बाद, इसने पाँच युद्ध सम्मान जीते हैं, जिनमें 2 अशोक चक्र, 1 विक्टोरिया क्रॉस, 2 जॉर्ज क्रॉस, 11 कीर्ति चक्र, 8 महावीर चक्र, 3 सैन्य पदक, 53 शौर्य चक्र, 38 वीर चक्र और 343 सेना पदक शामिल हैं.
सुधी पाठकों यह बताना परमावश्यक है कि रेजिमेंटल बटालियन – जाट रेजिमेंट में 21 नियमित बटालियन, 4 राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन और 2 प्रादेशिक सेना बटालियन हैं.इनमें सभी धर्मों,जातियों व क्षेत्रों के निवासियों की भर्ती होती है.इस समय जातिय आधार पर कोई भी रेजिमेट नहीं है और न ही होनी चाहिए. जाट रेजिमेंट का उदघोष है—‘जाट बलवान,जय भगवान’. इसके बावजूद भी एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में जाट रेजिमेट में भारतीय जाटों संख्या अधिक है. आज भी ,जाट समुदाय सेना की नौकरी को नौकरी न मानकर अपनी आन,मान व शान मानता है .सर छोटू राम की मिलिट्री स्ट्रैटेजी आज भी हरियाणा के युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बड़ा सोर्स है. भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने 20 नवंबर 2019 को पार्लियामेंट में एक सवाल का जवाब देते हुए बताया कि इंडियन आर्मी में कुल 13,41,944 जवान, JCO, एयरमैन और सेलर थे. जबकि हरियाणा में मिलिट्री में 7,294 JCO और 58,897 दूसरे रैंक के लोग, नेवी में 727 ऑफिसर और 6164 सेलर, और एयर फोर्स में 1040 ऑफिसर और 13,524 एयरमैन थे. 2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा की आबादी भारत की कुल आबादी का सिर्फ़ 2.5% है. हालाँकि, आर्मी में हरियाणा का रिप्रेजेंटेशन उसकी आबादी के अनुपात से कई गुना ज़्यादा है.
सामाजिक,आर्थिक, व राजनीतिक प्रभाव:.
हरियाणवी समाज पर निम्नलिखित सामाजिक,आर्थिक, व राजनीतिक प्रभाव पड़े:
प्रथम, सेना में भर्ती होने के परिणाम स्वरूप सैनिक परिवारों की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार होने के कारण उनकी जीवन शैली में परिवर्तन होने लगा.
द्वितीय, स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और इसके पश्चात हरियाणा के युवा विभिन्न युद्धों के दौरान जो सैनिक विदेशों में गए, उनकी सोच पर गहरा असर पड़ा और गांव वालों में उनके लिए इज़्ज़त की गहरी भावना पैदा हुई. इस भावना का खेती करने वाले समुदायों, खासकर जाटों पर बहुत असर पड़ा और जागरूकता बढ़ी. आर्थिक और एजुकेशनल विकास के साथ-साथ, जाटों में एक “लड़ाकू जाति” और “बहादुर समुदाय” के तौर पर गर्व की भावना में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई और उन्होंने सर छोटू राम के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा की .
राजनीतिक चेतना :
आज़ाद भारत में, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में कई जाटों का राजनीतिक परिदृश्य पर दबदबा था. उदाहरण के लिए, चौधरी चरण सिंह (जाट -पश्चिमी U.P.) आज़ाद भारत में सबसे ऊंचे पदों पर पहुंचे और उन्हें पहले किसान प्रधानमंत्री बनने का श्रेय जाता है. ताऊ देवी लाल (जाट हरियाणा) ने वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में दो बार उप-प्रधानमंत्री बनने का श्रेय है . जगदीप धनखंड (जाट -राजस्थान) को भारत के 14वें उपराष्ट्रपति थे.
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान छोटू राम ने जिस तरह किसान जातियों को एकजुट किया, उसका सबसे ज़्यादा प्रभाव जाट हार्ट लैंड़ में हुआ और विशेष तौर पर जाट समुदाय में जो चेतना पैदा हुई, वह आज भी कृषि के अलावा जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों – सेना, शिक्षा, खेल, बिज़नेस, फ़िल्म इंडस्ट्री और राजनीति – में बढ़ रही है.
.संक्षेप में. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जिस तरह सर छोटू राम ने किसान जातियों को एकजुट किया, उसका सबसे ज़्यादा असर हरियाणा और पंजाब पर पड़ा, और जागरूकता पैदा हुई, खासकर जाट और गैर-जाट समुदायों में, वह आज भी खेती के अलावा ज़िंदगी के अलग-अलग क्षेत्रों – सेना, शिक्षा, खेल, बिज़नेस, फ़िल्म इंडस्ट्री और राजनीति में बढ़ रही है। सच में, वह साउथ एशियन सब-कॉन्टिनेंट में सबसे पॉपुलर किसान नेता थे और उनकी मिलिट्री स्ट्रैटेजी आज की सदी में भी प्रासंगिक है.
nsअन्तत:अल्लामा इकबाल की नज़्म “तुलु-ए-इस्लाम” ((The Rise of Islam)) का यह शेर महान नेता – सर छोटू राम के व्यक्तित्व के लिए बिल्कुल सही है:
हज़ारों साल नरगिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा.
जारी रहेगा

लेखक- रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक एवं पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल हैं।
