कविता
कठिन नहीं है ताली बजाना
राजकुमार कुम्भज
कठिन नहीं है ताली बजाना
लेकिन कठिन है ये समझना कि क्यों
और ये समझना तो कठिन है और-और
कि कब बजाना,कहा बजाना
बात बे-बात पर यूॅं ही,यूॅं ही बजाना ताली
है कठिन,वाक़ई है कठिन बहुत-बहुत
दाऍं और बाऍं की टक्कर से आती है ताली
ग़ाली भीआती है दाऍं-बाऍं की टक्कर से ही
टक्कर नहीं,ताली नहीं,ग़ाली नहीं
फिर सम्मान क्या,असम्मान क्या
ताली से कहीं अधिक सम्मान है ग़ाली का
निरंतर बदलते जा रहे आज के लोकतंत्र में
ताली और ग़ाली आभूषण हैं लोकतंत्र के
ग़लत जगह ताली बजा देना ठीक नहीं
सबूत है नितांत और ख़ालिस बुद्धिहीनता
और सही जगह ताली नहीं बजाना
दर्शाता है विवेकवान बुद्धिवान कायरता
ग़लत जगह ग़ाली सबूत है ग़लत होना
और सही जगह ग़ाली नहीं देना
दर्शाता है सामूहिकता के डर से डर जाना
डरता वही है जो हरदम बजाता है ताली
और बीच भॅंवर तना रहता है जैसे शिखंडी
और डरता रहता है फिर-फिर ग़ाली से
ज़रुरी है ऐसे में ढूँढ़ना समझ और आग
मैं ढूँढता हूँ वसंत और टक्कर
मैं ढूँढता हूँ टक्कर और टकराना
मैं ढूँढता हूँ टकराना और एक लौ
लौ वही जो प्रकाशमान बूँद-बूँद पानी में
ज़ाहिर हो जिसमें कोई एक विचार भी
इसे जानें सब जानें तो है शायद बेहतर
और अगर नहीं जानते हैं तो क्यों नहीं
करें कोशिश और जानें ज़रा जल्दी जानें
कि टकराने से ही सुलगती है दुनिया
कि टकराने से ही बदलती है दुनिया
कि टकराने से ही सॅंवरती है दुनिया
यूक्रेन और तिब्बत-ताईवान में इस वक़्त
है जो भी है,जैसा भी है कम-कम कमतर
उजियारे-अंधियारे जैसा कुछ-कुछ
क्या नहीं आतंक,कालिख,कलंक
क्या नहीं अतिक्रमण क़दम साम्राज्यवादी
क्यों,कैसे,किस निमित्त,किस कारण
भिन्न नहीं वेनेजुएला से ज़रा भी भिन्न नहीं
और बात बे-बात ताली बजाने से पहले
एक ज़रुरी सूचना हो सकती है ये भी
कि ताली होती है सिर्फ़ तमाशाभर नाम
ग़ाली ही होती है ख़ास दूर तक काम की
कठिन नहीं है ताली बजाना कहीं भी
बशर्ते कि हो नहीं ख़ाली>
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