प्रेम कुमार मणि की टिप्पणी – हिन्दी का लेखक

दो दिन पहले वागर्थ के संपादक  डॉ शंभुनाथ ने हिंदी लेखन की स्थिति पर अपनी चिंता जताते हुए एक छोटी सी टिप्पणी अपने फेसबुक वॉल पर लिखी थी।  उसे पढ़कर हिंदी के एक विद्वान प्रेमकुमार मणि ने अपने फेसबुक वॉल पर उस बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। प्रतिबिम्ब मीडिया में डॉ शंभुनाथ की टिप्पणी प्रकाशित की गई थी। अब  प्रेमकुमार मणि की टिप्पणी आई है तो उसे भी पढ़िए और सारी चींजें स्पष्ट हो जाएं इसलिए इस टिप्पणी के नीचे दोबारा शंभुनाथ की टिप्पणी भी दे रहे हैं, उसे भी पढ़िए।  हमारी कोशिश रहेगी कि इस विषय पर और भी कोई लिखता है तो उसे भी प्रतिबिम्ब मीडिया के पाठकों को पढ़वाया जाए।  संपादक

 

हिन्दी का लेखक

प्रेम कुमार मणि

 

विद्वान आलोचक साथी शम्भूनाथ की एक टिप्पणी से गुजरते हुए कल मर्माहत हुआ. उनकी चिन्ता है कि हिंदी साहित्य के सौ साल के इतिहास में कोई नोबेल हासिल करने वाला लेखक तो नहीं ही हुआ, कोई ऐसा लेखक भी क्यों नहीं हुआ, जिसने पाब्लो नेरुदा या न्यूगी व थ्योंगो जैसा भी सामाजिक सम्मान हासिल किया हो. जबकि उपरोक्त लेखक बहुत कम आबादी वाले देशों के थे. इनके मुकाबले पचास करोड़ से अधिक की भाषा, जो एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाले देश की राजभाषा भी है, की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है ? शम्भूनाथ जी का पूरा लेख पढ़ने केलिए मैं उनके वाल को ही ढूंढने की सिफारिश करूँगा, किन्तु इतना जोड़ना चाहूँगा कि कमो-बेस इस जैसी चिन्ता से मैं भी जुड़ा अनुभव करता हूँ.

क्या हमारे समाज में हर दौर में लेखकों की स्थिति ऐसी ही थी ? शायद ऐसा नहीं था. इस हिंदी समाज के बीच एक दौर में प्रेमचंद थे. राहुल, यशपाल जैसे लेखक भी थे जो सम-सामयिक विषयों पर लगातार लिखते थे और उनका रचनात्मक साहित्य भी उनके विचारों को प्रतिबिंबित करता था. मसलन प्रेमचंद ने जब ‘ शतरंज के खिलाडी ‘ कहानी 1924 में लिखी थी, तब देश में राष्ट्रीय आंदोलन का पहला दौर चल रहा था. असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया था, लेकिन देश भर में राष्ट्रीयता अपने अंदाज़ में अंगड़ाई ले रही थी. शतरंज के खिलाडी एक कहानी तो है, लेकिन केवल मन-बहलाव वाली नहीं है. वह जमे-जमाये दिमाग को झक-झोरती है. स्थापित मान्यताओं को एकबारगी धक्का देती है. उस समय के राष्ट्रवादी इतिहासकार और राजनेता यही कह रहे थे कि भारत में अंग्रेजी राज जाल-फरेब से आया है. 1757 के पलासी युद्ध के बारे में यही कहा जाता रहा कि मीरजाफर ने यदि धोका न दिया होता तो अंग्रेज वह लड़ाई नहीं जीत सकते थे. उसके बारे में प्रचलित तमाम ब्योरे यही बताते थे कि भारत सोने की चिड़िया थी और अंग्रेज यहाँ लूटने आये थे.

प्रेमचंद ने शतरंज के खिलाड़ी में पहली बार बताया कि मुगलिया दौर की अय्याशी और किसानों-मिहनतक़शों से राजकाज की दूरी ने ऐसी सामाजिक स्थिति पैदा कर दी थी कि अंग्रेजों केलिए मार्ग प्रशस्त हो गया. प्रेमचंद ने बंगाल को नहीं अपने अवध को देखा था. कहानी का आरम्भ ही होता है ‘ वाजिद अली शाह का जमाना था अवध विलासिता में डूबा था. ‘ वह अवध हो, बंगाल हो, मैसूर हो या पुणे हो सब जगह की स्थिति ऐसी ही थी. सब की विलासिता के चर्चे जन-जन में थे. लगातार अकाल पड़ रहे थे, किसान मर रहे थे और इन नवाबों की विलासिता बढ़ती जाती थी. इन सब की सोच कैसी थी इसकी एक झलक 1857 के विद्रोह में अवध के बच्चा नवाब बिरजिस कदर, जिसे विद्रोहियों ने उसकी माँ हजरत महल के संरक्षण में नवाब बनाया था, के घोषणापत्र में देख सकते हैं. बड़े ठसक से यह घोषणापत्र दावा करता है कि अंग्रेजों के पहले का राज बड़े लोगों का, ऊँची जाति के लोगों का राज था और कोई पाजी, चूड़ा, चमार, धानुक या पासी इनकी बराबरी नहीं कर सकता था. ये अंग्रेज ऊँचे लोगों की इज्जत लेकर उन्हें चूड़े चमारों के बराबर किये दे रहे हैं.

जब प्रेमचंद उपरोक्त सोच और जीवन शैली की आलोचना कर रहे थे, जो सामंतवादी ढाँचे का था और किसान-मजदूरों के हितों के विरुद्ध था तब वह विचारों की एक नयी दुनिया भी गढ़ना चाह रहे थे. सदगति, ठाकुर का कुंआ, पूस की रात या फिर कफ़न जैसी कहानियों से वह एक विचार भी रख रहे थे. हंस और दूसरी पत्रिकाओं में अग्रलेख लिख कर उन्होंने सम-सामयिक विषयों पर पर्याप्त लिखा. राहुल, यशपाल जैसे लेखकों ने भी यह सब किया. इन लेखकों की सामाजिक प्रतिष्ठा भी कम नहीं थी. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी में ऐसा नहीं था. था. लेकिन यह परंपरा धीरे-धीरे ख़त्म लोने लगी. जो दुखद है.

आज हिंदी के कवि या कहानी-उपन्यास लेखक कुछ तन कर चलते हैं. आत्ममुग्धता से भरी उनकी तुनक-मिजाज दुनिया अत्यंत छोटी है. लेकिन गुमान है कि हम शुद्ध लेखक हैं. किसी भी सामाजिक संकट पर मुंह खोलना ये मुनासिब नहीं समझते. उनका ध्यान केवल पुरस्कारों पर होता है. वह जीवन केलिए नहीं, पुरस्कारों केलिए लिखते हैं. उनकी जीवन शैली और उद्देश्य तय है. साल में दो चार लिट् फेस्ट के चक्कर लगा आना, जहाँ हवाई यात्रा के साथ दो घूंट दारु और लजीज़ भोजन लेने का मुफ्त अवसर मिल जाता है. अख़बार के तीसरे चौथे पृष्ठ पर सिंगल कालम की खबर में अपने को ढूँढ लेना और इस या उस मंत्री-संत्री से शाल ग्रहण कर लेना ही उनका लेखक होना होता है. तंग से तंग विचार के बीच वे सुरक्षित रहना चाहते हैं. वाम दौर में वाम और भगवा दौर में भगवा होते उन्हें देर नहीं लगती. अब ऐसे लेखकों को जनता पाब्लो नेरुदा की तरह सम्मान क्यों दे. दरअसल ये लोग गुलशन नंदा और कुशवाहा कान्त जैसी और जितनी नैतिकता भी धारण नहीं करते.

एक रचनाकार अपने शब्दों और विचारों से एक दुनिया की प्रस्तावना करता है. वह एक यूटोपिया केलिए लिखता है. कोई अमरदेस तो कोई रामराज केलिए लिखता है. प्रेमचंद ने कहा है वह राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है. वाल्मीकि और व्यास ने एक दुनिया गढ़ी. वे इतिहास गढ़ रहे थे. उनका लिखा हुआ आज इतिहास से ऊपर है. इतिहास उसके पीछे चला है. आज के ज़माने में आवें तो हम टॉलस्टॉय या रवीन्द्रनाथ को लें. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर पूरी दुनिया में घूम घूम कर राष्ट्रवाद के खतरों से लोगों को सचेत करते रहे. भारत में उन दिनों राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था. उसके प्रथम चरण के दौरान ही गोरा और घरे बाइरे लिख कर उन्होंने राष्ट्रवाद के खतरों के प्रति हमें सचेत किया था. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वह वृद्ध और बीमार थे, लेकिन सभ्यता का संकट शीर्षक लेख लिख कर मानव जाति के भविष्य पर चिन्ता की थी.

आज टैगोर और प्रेमचंद की संततियां क्या कर रही हैं ? हर छह माह पर किताब पटक देने से कोई लेखक नहीं बन जाता . लेखक का व्यक्तित्व भी होना चाहिए. व्यक्तित्व के पीछे नैतिकता होती है. दरअसल लेखकों में इस नैतिकता का चिर अभाव हो रहा है.

आज हिंदी की स्थिति अधिक दयनीय है. मैंने अनेक बार इस संबंध में गांधी का स्मरण किया है. हिंदी इलाके की वैचारिक दरिद्रता के कारणों पर गांधी ने गहराई से विचार किया था. सब जानते हैं कि दो बार वह हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहे. पहली बार 1918 में और दूसरी बार 1935 में. 1935 के इंदौर साहित्य सम्मेलन में उन्होंने हिंदी लेखकों से पूछा था – आपके पास कोई रवींद्र, जगदीश चंद्र बसु और प्रफुल्ल्चंद्र राय क्यों नहीं है ? हिंदी वालों के पास कोई जवाब नहीं था. ज्यादातर लोग तो प्रश्न की गंभीरता ही नहीं समझ सके. इनमें कवि निराला भी थे. साल भर बाद निराला ने गांधी को लखनऊ में ढूँढ लिया और उनसे कुछ सवाल किये. स्वयं निराला ने इस संस्मरण को लिखा है, जो उनकी किताब प्रबंध प्रतिमा में संकलित है. जब निराला जैसा कालजयी कवि गांधी के निहितार्थ को नहीं समझ सका, तब दूसरे रचनाकारों के बारे में टिप्पणी करना फिजूल है. गाँधी उन परिस्थितियों की बात करना चाहते थे जिसने रवीन्द्र जैसे रचनाकार को पैदा किया. वही स्थितियां दो वैज्ञानिक भी पैदा करती है. हिंदी क्षेत्र में तो लेखक और साधुओं का अनुपात दो-एक का होता है. यहाँ लेखक भी उसी अंदाज के होते हैं. जब यहाँ साहित्य में प्रगतिशील दौर चला तो पाखंड अधिक बढ़ गया. परसाई जी ने एक जगह अपने अंदाज़ में लिखा है कि दाएं हाथ का लिखा तो हर कोई समझ जाता है, जनता को धोखा देना हो तो बाएं हाथ से लिखो. बाएं हाथ के पाखण्ड का धुंध हिंदी में आज तक छाया हुआ है.

 

अब शंभुनाथ का लेख पढ़िए-

कभी–कभी अचानक यह प्रश्न दिमाग में आता है कि हिंदी में पिछले सौ वर्षों में ऐसे साहित्यकार क्यों नहीं हुए जिन्हें नोबेल पुरस्कार भले न मिला हो पर वे दुनिया के देशों में उस तरह याद किए जाते हों जिस तरह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका या यूरोप के दो–तीन करोड़ की आबादी वाले छोटे देशों के पाब्लो नेरुदा, न्यूगी वा थ्योंगो जैसे अनगिनत लेखक याद किए जाते हैं। दुनिया में हिंदी लेखकों की कमजोर उपस्थिति का क्या कारण है?
1947 के पहले के हिंदी लेखक कितने सामंती दबावों और आर्थिक तंगी में काम कर रहे थे, हम जानते हैं। प्रेमचंद, प्रसाद, निराला और इस काठी के लेखकों में से किसी को किसी दूसरे देश में जाने का अवसर नहीं मिला था जबकि रवींद्रनाथ 17 साल की अवस्था में, 1877–78 में साल भर इंग्लैंड रह आए थे।
विश्व भ्रमण उस समय ज्ञान–संवेदना के विस्तार में सहायक साबित हो रहा था। इससे वंचित होने के बावजूद उस दौर में सामने आए हिंदी साहित्यकारों ने तब बहुत कुछ बहुमूल्य दिया जो संजो कर रखने लायक है। वे महज लेखक नहीं साहित्यकार थे।
विदेशों के हिंदी जानने वाले कुछ अध्यापकों द्वारा कुछेक हिंदी किताबों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद करा लेने के बावजूद देखा जाए तो, पिछले 50 सालों में उभरे हिंदी लेखकों की विश्व उपस्थिति जीरो है। यह एक कटु सच्चाई है, पचपन करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी के लेखकों को पढ़ने में विदेशी पाठकों का जरा भी उत्साह नहीं है, जिस तरह हममें विदेशी लेखकों और सिद्धांतकारों को पढ़ने के लिए रहता है।
हिंदी लेखकों की विश्व उपस्थिति को प्रधान कसौटी न भी बनाया जाए, तब भी प्रश्न रखा जा सकता है कि पिछले 50 सालों में उभरे लेखकों के लिखे में क्या–क्या है जो संजो कर रखा जाना चाहिए और ऐसी कृतियाँ कम क्यों हैं जिन्हें श्रेष्ठ कहा जाए। यदि हिंदी लेखकों के पुरस्कारों/ सम्मानों से लदे होने के बावजूद उनके लिखे से संजो कर रखे जाने लायक बहुत कम है तो इसके क्या कारण हैं? इन कारणों पर ध्यान दिया जा सकता है :
1) सामान्यतः हिंदी लेखकों ने प्रभाव और अनुकरण में फर्क नहीं किया। उन्होंने पश्चिमी साहित्यिक दुनियाओं के चर्वितचर्वन से भिन्न बहुत कम दिया, जैसा कि अफ्रीकी–लैटिन अमेरिकी भाषाओं के लेखकों ने पश्चिमी साहित्य और सिद्धांतों से भिन्न बहुत कुछ दिया है।
इसलिए विदेशी पाठकों ने हिंदी के अंग्रेजी अनुवादों में अपना ही जूठा भोजन खाना पसंद नहीं किया!
2) ज्यादातर हिंदी लेखक प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी ’रचनाकार’ कम ’खिलाड़ी’ ज्यादा बनते गए। किसी अन्य ने नहीं सत्ता में पैठे उनके अपने संरक्षकों ने उन्हें ऐसा ही प्रशिक्षण दिया। इसका असर उनके मन की निर्मलता पर ही नहीं, उनकी रचनात्मकता और गुणवत्ता पर भी पड़ा।
3) अब के हिंदी लेखकों के विदेश भ्रमण कम नहीं हैं, सम्पन्नता के मामले में भी ऊंचाइयां हैं, पहले की तरह आमतौर पर आर्थिक तंगी नहीं है। पर आम परिदृश्य के अनुरूप ’भौतिक उत्थान तथा बौद्धिक–नैतिक पतन’ का सुविधावादी मामला बढ़ा–चढ़ा है।
पिछले कुछ दशकों से हिंदी लेखकों के संसार में इतनी अधिक स्वार्थपरता, वैचारिक दृढ़ता का अभाव, अध्ययन की कमी, गुटबाजी, गंभीरता की कमी या ’ तुरंत डिलीवरी’ , स्थानीयतावाद, व्यक्तिगत पसंद–नापसंद, ’विचारधारा से मुनाफाखोरी’ और ’खेल’ में इतनी अधिक लिप्तता है कि ऐसी चीजों के बीच रहते हुए महान लेखन क्या अच्छा लेखन भी संभव नहीं है!
फिर इन दिनों निहुरे–निहुरे ऊंटों की जमकर चोरी हो रही है! पचपन करोड़ हिंदी भाषियों के बीच हमारा हिंदी साहित्य अब महज चार–पांच हजार लोगों की क्षमता वाला स्टेडियम बन गया है, सीमाबद्ध! आम हिंदी भाषियों की नजर में कुमार विश्वास जैसे व्यक्ति महाकवि हैं। साहित्य के अधिकांश लोग कभी फेन्स के इधर हैं कभी उधर, रीढ़ गल रही है!
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