पुस्तक समीक्षा
समय की शिराओं में धड़कती कविता : जयपाल का काव्य-संसार
प्रतिरोध, पुनर्सृजन और मानवीय अस्मिता का विमर्श
एस.पी. सिंह
हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर जयपाल का काव्य-संसार समकालीन भारतीय समाज की अंतर्ध्वनियों, विसंगतियों और प्रतिरोधी चेतना का एक गंभीर सांस्कृतिक अभिलेख है। उनकी कविताएँ केवल भावोच्छ्वास नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक आत्मपरीक्षण की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। जनवादी-प्रगतिशील वैश्विक मानवीय मूल्यों का समुच्चय जयपाल की कविता की वैचारिक रीढ़ बनता है।
जयपाल का पहला कविता-संग्रह ‘दरवाज़ों के बाहर’ और समीक्ष्य कृति “कविता भी तुम्हें देखती है”—दोनों ही इस बात के साक्षी हैं कि उनकी कविता दर्शक नहीं, सहभागी है; वह समाज को केवल देखती नहीं, उससे संवाद करती है।
जयपाल की कविताओं का मूल स्वर सामाजिक-राजनीतिक चेतना से अनुप्राणित है। जाति-आधारित भेदभाव, दलित उत्पीड़न, स्त्री-विमर्श, श्रम और किसान-जीवन, युद्धोन्माद, धार्मिक उन्माद, लोकतंत्र की विडंबना—ये उनके काव्य के केन्द्रीय तत्व हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति और संविधान के लागू होने के दशकों बाद भी समाज में व्याप्त विषमता को उन्होंने प्रश्नांकित किया है। यहाँ उनकी कविता अप्रत्यक्ष रूप से उस संवैधानिक आत्मा की स्मृति को जगाती है, जिसे भीमराव अंबेडकर ने निर्मित किया था। आपकी रचनाएँ यह संकेत देती हैं कि संविधान केवल दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नैतिक आचरण का मानक है और जब समाज उससे विचलित होता है, तो कविता प्रतिरोध का माध्यम बनती है।
“शिकार पर” कविता में सत्ता का हिंस्र चेहरा उद्घाटित होता है। ईश्वर का कण-कण में छिप जाना और तानाशाह का शिकार पर निकलना—यह दृश्य प्रतीकात्मक होते हुए भी हमारे समय का यथार्थ है। यहाँ भाषा सरल है, पर अर्थ-स्तर बहुआयामी ।
“गर्व” कविता मनुष्य की मनोवैज्ञानिक परतों को खोलती है। धर्म और जाति पर अंध-गर्व की परिणति पड़ोसी की हत्या में—यह कथ्य किसी विशेष घटना का विवरण नहीं, बल्कि सामूहिक उन्माद का प्रतिरूप है। माँ का प्रश्न—“शर्म नहीं आई?”—और उत्तर—“शर्म किस बात की!”—इस संवाद में समूची नैतिक पराजय सन्निहित है।
यहाँ कवि व्यंग्य नहीं करता बल्कि आत्मालोचन की स्थिति रचता है। यही उनकी कविता की नैतिक शक्ति है।
तीन खंडों में विभक्त “युद्ध के बाद” केवल युद्ध-विरोधी कविता नहीं; यह मानवीय पुनर्निर्माण का उद्घोष है।
प्रकृति की सूक्ष्म इच्छाएँ—“एक मुट्ठी भर आसमान”, “अंजुरी भर पानी”—मानव सभ्यता के पुनः अंकुरण का संकेत देती हैं।
दूसरे खंड में बची हुई मनुष्यता की करुण छवियाँ—“कुएँ में गिरे पक्षी”, “सूखी हुई नदियाँ”—युद्ध की अमानवीयता का बिंब हैं।
तीसरे खंड में धर्म, इतिहास ,संस्कृति और विज्ञान के राजनीतिकरण के प्रति कवि गहरी चिंता प्रकट करता है। कवि इसे अपनी कविता में राजनीतिक प्रदूषण करार देता है और सत्ता की मंशा पर सवाल उठाता है।
कविता भी तुम्हे देखती है- कविता संग्रह की कविताओं के शीर्षक ही कवि की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं का परिचय दे रहे हैं। जैसे-“लोकतंत्र”, “राज-शाही”, “धृतराष्ट्र”, “राजा के कबूतर” — सत्ता-चेतना का विश्लेषण और
“मजदूर”, “मजदूरी पर जाते हुए”, “रोटी बनाम कविता” — श्रम और अस्तित्व का प्रश्न है। इसी तरह
“आस्था और विश्वास”, “ईश्वर और ख़ुदा के नाम” — धर्म की मानवीय पुनर्व्याख्या है।
“अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस”, “औरत और पतंग”, “आ रही हैं बेटियां” — स्त्री-स्वातंत्र्य का स्वर हैं।
“गज़ा पट्टी”, “हम शरणार्थी हैं साहेब!” — वैश्विक मानवीय संकट का विस्तार है।
“भगत सिंह और किसान”, “जन विद्रोह”, “क्रान्तिकारी कविता” — ऐतिहासिक चेतना और परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतीक है।
यह विविधता किसी बिखराव का संकेत नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संवेदना का प्रमाण है।
उनकी कविताओं में दलित समाज के उत्पीड़न और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर विशेष संवेदनशीलता दिखाई देती है। उनकी दृष्टि आरोपात्मक नहीं, विश्लेषणात्मक है। वे नारे नहीं लिखते बल्कि अनुभव की अंतर्धारा को पकड़ते हैं।
यहाँ कविता शिक्षाप्रद है, पर उपदेशात्मक नहीं। बच्चों और युवाओं के लिए उनका साहित्य इसलिए उपयोगी है कि वह उन्हें प्रश्न पूछना सिखाता है, पर घृणा नहीं सिखाता।
उनकी भाषा में अलंकारिक चमत्कार नहीं, बल्कि विचार की स्पष्टता है।
रूपक-संरचना “जली हुई लाशों की तरह नागरिक” एक मर्मस्पर्शी वाक्य है।
कवि का संक्षिप्त वाक्य-विन्यास ,कथ्य को तीक्ष्ण बनाता है । युद्ध, मलबा, दरवाज़ा, खिड़की—ये सभी प्रतीकात्मक सामाजिक संकेतक हैं
जयपाल की कविता में विवाद का शोर नहीं, बल्कि तर्क का संतुलन है। यही कारण है कि आप बिना आक्रामकता के भी अपनी बात स्थापित कर लेते हैं।
जयपाल की कविता समय की नब्ज़ पर हाथ रखती है। वह संविधान की आत्मा, लोकतंत्र की मर्यादा, दलित और स्त्री अस्मिता, श्रम और किसान के संघर्ष—इन सबको एक मानवीय परिप्रेक्ष्य में देखती है।
उनकी रचनाएँ यह स्मरण कराती हैं कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक घटना नहीं बल्कि एक सतत सामाजिक साधना है। यदि समाज उस साधना से विमुख होता है, तो कविता चेतावनी बनकर सामने आती है।
उनका काव्य-संसार इस विश्वास का साक्ष्य है कि शब्द यदि ईमानदार हों, तो वे समाज को शिक्षित भी करते हैं, प्रेरित भी, और आत्मालोचन के लिए विवश भी।
कवि जयपाल की कविता में प्रतिरोध की आग भी है और पुनर्सृजन की रोशनी भी।
“कविता भी तुम्हें देखती है”, पाठक की निराशा को तोड़कर उसमें आशा का संचार करती हैं और अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने का आह्वान करती हैं।
बेहतर समाज के लिए लिखी गई बेहतर कविताओं के लिए कवि को सलाम !!

कवि- जयपाल
पुस्तक का नाम- कविता भी तुम्हें देखती है
कवि– जयपाल(9466610508)
कीमत-199/- ( पेपर बैक )
प्रकाशक-यूनिक पब्लिशर्स-कुरुक्षेत्र
90009-68400

समीक्षक- एसपी सिंह
एसपी सिंह पत्रकार और साहित्यकार हैं।
