मंजुल भारद्वाज की कविता – आधुनिक युग का अमृतकाल 

आधुनिक युग का अमृतकाल

– मंजुल भारद्वाज

 

खुशी खुशी नहीं लगती

उपलब्धि उपलब्धि नहीं लगती

सत्ताधीश ने फ़िज़ा में 

ऐसा ज़हर घोला है कि

ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं लगती !

कहने को सुबह शाम होती है 

फूल खिलते हैं 

महकते हैं 

पर व्यवस्था की बदबू इतनी है कि

ख़ुशबू दम तोड़ देती है!

ऐसा नहीं कि दुनिया में 

ऐसे दौर आए नहीं हैं 

ज़ालिमों ने ज़ुल्म ढहाए नहीं

लेकिन दुनिया इतनी बेज़ार 

लाचार नहीं थी 

कहीं कोई चिंगारी किसी राख में 

छुपी थी 

जिसने दुनिया को ज़ालिमों से आज़ाद कराया !

आज मति भ्रमित है 

मनुष्य अपनी लाश को ढो कर

अमृतकाल का जश्न मना रहा है 

सिंदूर पोछने वाले को 

सिंदूर का रक्षक समझ रहा है!

असत्य,हिंसा,द्वेष,नफ़रत से

ग्रसित सत्ताधीश 

आज पूरी दुनिया में 

मनुष्यता के क़त्ल का 

लाइव जश्न मनाते हैं 

बुद्धिजीवी जिसे विज्ञान वाला

आधुनिक युग कहते हैं!