कविता
अर्बन एस्टेट
ओमप्रकाश अशफ़ाक
बाहर से बेशक
तंदुरुस्त ही दिखते हैं-
अर्बन एस्टेट के लोग!
भीतर से लेकिन
लग चुका है उनको-
कनसुआ-सा घातक कोई रोग!
वे रहते हैं परेशान से-
पर कारण परेशानी का
तलाश नहीं पाते हैं
कुछ दिन में सायास मुस्कुराते हैं
कुछ रात में बरबस बड़बड़ाते हैं..
हर शाम अधजगे सो जाते हैं
हर सुबह अधसोये जग जाते हैं
अर्बन एस्टेट के लोग!
वे पालते हैं खरगोशनुमा कुत्ते भी
रखते हैं हरक़तवान खिलौने-
मसलन टी.वी., टेलीफोन, टू-इन-वन
और भी कई अटरम-सटरम
पर उनमें रम नहीं पाते हैं-
अर्बन एस्टेट के लोग!
वहाँ बच्चे हैं, जवान हैं, औरतें हैं, मर्द हैं
और इक्का-दुक्का घरों में हैं-बुजुर्ग भी
फिर भी
न जाने किस अभाव से ग्रस्त हैं
कि मकानों को घर बना नहीं पाते हैं-
अर्बन एस्टेट के लोग!
अहंकार में हो गई है
हर-एक की नाक लम्बी दूसरे से-
हालांकि हकीकत में वह वैसी ही है
जैसी होती आई है सदियों पहले से-
फिर भी हर समय नाक-भौं चढ़ाये फिरते हैं-
अर्बन एस्टेट के लोग!
पुरुषों के मुखमंडल-
किसी अज्ञात पीड़ा से तने हैं
औरतों के चेहरे रूखे होंठ सूखे
पाउडर, लिपस्टिक से सने हैं
इन सब के बीच अनमने बच्चे
करते अनुचित उपभोग
जाने कब समझेंगे-
अर्बन एस्टेट के लोग?
यूँ वे आज़ाद हैं पर कैद रहते हैं
अपने-अपने मकानों में
और ललचाते हैं-
खुलेपन के उस आनंद को
छोड़ आये हैं जिसे बहुत पीछे
अपने-अपने गाँवों की गलियों में-
कस्बों के मोहल्लों में-
ढूंढ नहीं पाते हैं उस जीवन स्पंदन को-
अर्बन एस्टेट के लोग!
जाने क्यों, बेमौसम गाते हैं
बेमतलब इतराते हैं-
मातम में खुशियाँ और खुशियों में
मातम मनाते हैं-
अर्बन एस्टेट के लोग!
(जुलाई–अगस्त 1993)
