कविता
बोल भाई नत्थूराम
ओमसिंह अशफ़ाक
हाड़ तुडावैं दिन-और-रात
गर्मी-सर्दी हो बरसात
कुणबे के ना पटते पूरे
सारे कारज़ पड़े अधूरे
कैसे जाऊं मथुरा-धाम !
बोल भाई नत्थूराम !
क़र्ज़े वाले़ केस मंगावें
इस कुणबे ने बड़ा बतावें
या तो हमने सुणली चर्चा
घणे-मानस, घणा-खर्चा
कुछ खर्चे का भी हो इंतजाम?
है ना भाई नत्थूराम !
महंगाई नै चाला़ पाड़़या
बुढ़ापे में फिरुं उघाड़या
कुणबे का ही एक सहारा
इसके सिवा कौंण है म्हारा?
इब क्यूंकर चाल्लै अपणा काम !
तू ही बता दे नत्थूराम !
बड़े-बड़े लीडर झूठ बोल्लैं
छके बाणियां घाट तोल्लैं
ना अफसर भी करते इंसाफ
रिश्वत इनकी माई-बाप
जनता की हुई नींद हराम !
के जतन बनेगा नत्थूराम !
यूं तो हमने पट गया बेरा
घर बणग्या भूतों का डेरा
जितनी मरजी करो कमाई
धोरै रहै ना धेल्ला-पाई
इब सोचणा होगा कुछ इंतजाम !
सच कह रह्या सूं नत्थूराम !
खरी कही भाई तैं घनश्याम
म्हारी गुठली उनके आम ?
फसल के बढ़ लिए चौखे दाम
पर पल्लै ना पड़ै छदाम
इब सोचणा हो पक्का इंतजाम !
हां खरी कही भाई तैं घनश्याम
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(जून 1990)
