मैं विजित नही, विजेता ही बनूंगा
मुनेश त्यागी
मैं स्त्री हूँ,
मैं साम्राग्यी भी रही हूँ,
मुझे रोंदने वाला मनुष्य,
मेरा दास भी रहा है,
मुझे देवियां भी माना गया है।
पर आज देखो,
मैं अनपढ हूं,
गंवार बना दी गई हूं.
कोठों का शबाब हूं,
मै इश्क की मल्लिका हूं,
इश्क मेरे बिना अधूरा है।
कौन नही आया मेरी शरण में,
अपने अधरों की प्यास बुझाने?
आजकल मेरे बेटे बेटियां,
मुझे गर्भ में ही मार डालते हैं,
दहेज के नाम पर मेरी,
होली भी जला लेते हैं।
कहने को तो मैं भगवानों,
की जननी भी रही हूं,
पर वे भगवान ही मेरे,
वस्त्र चुराते रहे हैं,
मेरी अग्निपरीक्षा और,
महलों से निकालते रहे हैं।
मैं बहुतेरों के लिए आज भी,
रसोई और बिस्तर का,
गणित ही रह गयी हूँ।
वैसे सारा भूगोल मेरे,
बिना अधूरा ही है,
कभी कभी मैं, बिजलियां
भी गिराती रही हूं,
अपनी मुक्ति के लिए,
छटपटाती रही हूँ।
पूरे इतिहास में मेरे साथ,
सबसे ज्यादा दुर्व्यवहार,
किया गया है।
तमाम आक्रांताओं ने मेरी,
अस्मिता को रौंदा है।
मेरे बेटों ने भी मुझ से,
अपनी वासना को तृप्त किया है,
मुझे मंदिरों में नंगा,
लटकाया गया है।
जब मैं अपने साथ हो रहे,
हजारों सालों के अन्याय,
भेदभाव, गैरबराबरी और हिंसाओं का
विरोध करती हूं तो,
मुझे कुल्टा और झगडालू,
बिगडैल कहा जाता है, और
मेरे साथ मेरे माता पिता को भी,
गालियों से नवाजा जाता है।
पितृसत्ता नाम की महामारी ,
हजारों साल से मेरा पीछा,
ही नही छोड रही है,
इसने मुझे सबसे ज्यादा ,
पीडा पहुचायी है,
और यह आज भी,
लाइलाज होकर मेरे,
सिर पर सवारी कर रही है।
क्या कभी किसी ने मेरे मन की
गांठ खोलकर पढने की कोशिकी है?
मैं आधी दुनिया की ,
प्रवक्ता हूँ, उष्मा हूँ, ऊर्जा हूँ,
मैं पूरी मानवता की जननी हूँ।
मैने बहुत झेला है,
अब सीमायें बरदास्त से,
बाहर हो गयी हैं,
मैं सब कुछ सहन करने,
की स्थिति में नही रही।
तभी मेरी गोद में,
रूस की 1917 की क्रांति में,
मेरे असली बेटे बेटियों ने जन्म लिया,
जिन्हें साम्यवादी कहा गया,
इन्होंने ही सबसे पहले मेरी सुध ली,
इन्होंने मुझे असली आजादी
के दर्शन कराये,
मुझे सच्ची बराबरी
के अधिकार दिये।
इन्होंने मुझे लडने का हौंसला दिया,
हिम्मत बटोरकर ना कहना सिखाया।
मुझे शिक्षित दीक्षित किया,
ताकि मैं मुठभेड़ कर सकूं,
मुझे रोंदते आ रहे,
हजारों साल पुराने ,
अविचल हालातों से।
इसके बाद मैने भी मुट्ठियां,
ताननी सीख ली.
अब मैं शिकारियों, शैतानों का
मुंह थामने लगी हूँ ।
फिर मैंने नारे लगाने सीख लिये,
और मैं भी अपने बेटे बेटियों,
के साथ चल पडी,
अपनी बहनों बेटियों की ,
वैश्विक मुक्ति के अभियान पर।
मुक्ति के अभियान पर यानी,,,,
शिक्षा के, इंसाफ के,
रोजगार के, समता के,
ममता के, समानता के,
सुरक्षा के,विकास के अभियान पर।
मेरे शिकारी अभी भी,
नही बैठे हैं चैन से,
अब उन्होंने अपना लिये हैं,
मुझे रौंदने के नये अस्त्र।
करने लगे हैं मुझ से गैंगरेप,
मुझे दहेज अग्नि की भेंट,
चढाने लगे हैं,
मुझे गर्भ में ही मार डालने,
का अविराम अभियान जारी है।
वे फिर से आमादा हैं,
मेरे हक और अधिकार छीनने को,
कभी किसी नाम पर,
कभी किसी नीति का सहारा लेकर।
अबकि बार नया हमला कर रहे हैं,
नवउदारवाद के नये हथियार से।
पेंशन, ग्रेचुईटी, बोनस,
और स्थायी नौकरी,नियमितिकरण,
सब कुछ झीनने पर आमादा हैं,
मेरे कुछ नालायक बेटे।
कुछ शैतान नेताओं ने धराशाई कर दिया था
मुझे एप्स्टीन फाइल में,
अब मैं बाहर निकल कर
एप्स्टीन फाइल से
नही बख्सूंगी, धराशाई करूंगी,
इन सब शैतानों को।
पर मैं भी अपने मुक्ति के
मिशन में लगी हुई हूँ,
अब मुझे सुबह की
लाल किरणें दिखाई देने लगी हैं.
अब मैं सारे रण सर करूंगी।
मैं हार नही मानूंगी,
सबको एकजुट करूंगी,
मुट्ठियां भीचूंगी,
नारे भी लगाऊंगी,
भृकुटी भी तानूंगी,
आंखें भी दिखाऊंगी।
अब मैं सब कुछ झेलूंगी,
पर पीठ नही दिखाऊंगी.
मशाल हाथों में थामकर,
कहूंगी,,,,,,,,,
अब मैं विजित नही,
विजेता बनकर ही,
सांस लूंगी।
