कविता
मत समझो कि आजाद हो तुम
मुनेश त्यागी
आदिवासियों, मत समझो तुम आजाद हो,
तुम्हारा अंगूठा काटने वाले, फिर लौट आये हैं।
दलित पीड़ितों, मत समझो तुम आजाद हो ,
तुम्हारी जीभ काटने वाले, फिर लौट आये हैं।
वेद सुनने वालों, मत समझो तुम आजाद हो,
कानों में शीशा डालने वाले, फिर लौट आये हैं।
हक मांगने वालों, मत समझो तुम आजाद हो,
तुम्हें जेल में डालने वाले, फिर लौट आये हैं।
मेहनतकशों, मत समझो तुम आजाद हो,
गुलामी वाले श्रम कानून, फिर लौट आये हैं।
अन्नदाताओं, मत समझो तुम आजाद हो,
फसलों को हडपने वाले, फिर लौट आये हैं।
आरक्षणियों, मत समझो तुम आजाद हो,
आरक्षण को छीनने वाले, फिर लौट आये हैं।
अल्पसंख्यकों, मत समझो तुम आजाद हो,
तुम्हें दुश्मन बताने वाले, फिर लौट आए हैं।
धर्म मानने वालों मत समझो तुम आजाद हो
पाखंडी अंधविश्वासी लोग, फिर लौट आए हैं।
हिंदुस्तानियों, मत समझो तुम आजाद हो,
हिंदू मुस्लिम करने वाले, फिर लौट आये हैं।
