कविता
फागुन के दिन
मृदुला सिंह
शीत की ठिठुरन
सिमटी
धूप देहरी चढ़ बिहँसी
चिरई- चिरगुन के
उल्लास के दिन
ये फागुन के दिन!
बेरों में उतरी लाली
अमराई में कोयल गाई
राई के खेतों में
उमड़ रही नदी पीली
प्रकृति के श्रृंगार के दिन
ये फागुन के दिन!
हल्दी की सोनहर गांठें
खोल रही गिरहें मन की
परबतिया के मन गुलाल के दिन
ये फागुन के दिन!
सरई के फूल इतराए
मादर की थाप पर जंगल नाचे
खाली बटलोई की आस जागी
किसान के परब त्योहार के दिन
महके बयार के दिन
ये फागुन के दिन !
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