कविता
एक झंडा बेचता है,एक झंडा खरीदता है!
– मंजुल भारद्वाज
दो दिन देश में
तिरंगा झंडा बिकता है
फुटपाथ पर
सड़क पर
रेलवे स्टेशन
बस अड्डे के आसपास
छोटे आकार से
बड़े आकार तक
स्टीकर,बैच और गुब्बारों
के आकर में !
सब तिरंगा खरीदते हैं
खुश होते हैं
देशभक्ति रग रग में दौड़ जाती है
गर्व,गौरव,स्वाभिमान से
गर्दन अकड़ जाती है
छाती चौड़ी हो जाती है!
पर कभी ग़ौर किया है
झंडा बेचता कौन है?
झंडा खरीदता कौन है?
झंडा बेचता है जो
मजलूम, ग़रीब
फुटपाथ पर रहने वाला
बच्चा,बच्ची,महिला,पुरुष
झंडा खरीदता कौन है?
पैसे वाला !
दो दिन साल में झंडा बिकता है
बेचने वाले को दुत्कार नहीं मिलती
झिड़कियां नहीं मिलती
पता नहीं वो दिन भर
झंडे बेचकर कितनी
दिहाड़ी कमाते हैं ?
साल दर साल
वो झंडा बेचते हैं
पर…
उनके हालात नहीं बदलते
फुटपाथ नहीं बदलता
ग़रीबी पीछा नहीं छोड़ती
मज़लूमियत से मुक्ति नहीं मिलती
फ़िर भी..
वो साल में
दो दिन झंडा बेचते हैं!
ग़रीब, मुफ़लिस के लिए
झंडे का क्या मतलब है?
खरीदे हुए झंडे
शाम होते होते
पुनः सड़क पर
बिखरे होते हैं
सुबह गर्व करने वाले खरीददार
शाम को बेफ़िक्री से
सड़क पर पड़े झंडों को
रौंदते हुए चलते हैं!ज८
खरीददारों के लिए
झंडे का क्या मतलब है?
एक इवेंट.. बस !
ग़रीबों के लिए
वो सुबह कब आएगी
जिसके लिए
तिरंगा फहराया जाता है ?

कवि – मंजुल भारद्वाज
