मंजुल भारद्वाज की कविता- पेट भरने के लिए रेंगती हुई भीड़ का नाम है, मुम्बई!

 

कविता

पेट भरने के लिए रेंगती हुई भीड़ का नाम है, मुम्बई!

मंजुल भारद्वाज

 

मुम्बई की भीड़ में

गहरा आक्रोश है

अफसोस यह है कि

यह आक्रोश व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं

अपितु खप,खर्च,जर्जर हो चुकी व्यवस्था में

एक दूसरे को कुचल कर

पछाड़ कर

क़त्ल कर

अपना पेट भरने के लिए है ।

 

मुम्बई एक बेतहाशा भीड़ है

जो सुबह शाम एक दूसरे को

रौंदती है रेल में

सड़क पर

बसों में

पर

व्यवस्था को कोई सवाल नहीं पूछती !

 

मुम्बई रेंगते हुए

दुनिया को बता रही है

कि वो दौड़ रही है

मुम्बई एक अजूबा है

जो अपनी लाश लिए

जी रही है।

 

मुम्बई भीड़ का शोर है

भीड़ में अन्दर गहरी

तन्हाई है

अकेलापन

असंतोष है

मुम्बई में सब होने के बावजूद

बिना वाली के

वो खाली और निरीह है!

 

मुम्बई एक दिशाहीन

भगदड़ है

जो पेट के बल रेंग कर

थक जाती है

अगले दिन दौड़ने के लिए!

 

मुम्बई को कौन चलाता है?

यह सवाल मुम्बई

खुद से कभी

पूछती है क्या ?

 

हां शोर ज़रूर मचता है

याद कदा

भाषा का

परप्रांतियों का

पर कभी पूंजीपतियों पर नहीं उठता !

वो मुट्ठीभर होते हुए भी

मुम्बई को भीड़ बनाकर

उसके श्रम को निचोड़

उसे सीधे खड़े नहीं होने देते

कि वो सोचे उसे कौन हांक रहा है !

 

पर क्या मुम्बई को

पूंजीपति चला रहे हैं ?

यहां भी एक चूहा दौड़ है

नरीमन पॉइंट को

न्यूयॉर्क हांक रहा है

बीकेसी को लन्दन

यूरोप और चीन भी

अपने अपने हिस्से को

नियंत्रित कर रहे हैं !

 

नरीमन पॉइंट का विस्तार

लालबाग़ की उजड़ी पुरानी मीलों के

नए टावर्स से होते हुए

बीकेसी तक पहुंच गया है !

 

लालबाग अब विरार,पालघर

बदलापुर ,पनवेल के बाहर

धकेल दिया गया है

और

धकेला जा रहा है।

 

पूंजीपतियों ने विकास की आड़ में

समुद्र के किनारों से मछुआरों

और संजय गांधी पार्क से

आदिवासियों को उजाड़ दिया है

यहां वो नव पूंजीवाद का मॉडल

खड़ा कर रहे हैं

जल,जंगल, ज़मीन को उजाड़ कर

विकास कर रहे हैं!

 

मुठ्ठी भर लोग मुम्बई को भीड़ बना

बारी बारी हर वर्ग को लूट रहे हैं

मृग मरीचिका में फंसा मध्यमवर्ग

पूंजीपतियों की लूट को

अपना तन मन लगाकर साकार करता है

और दस बीस साल में

फ्रस्ट्रेट हो

हार्ट अटैक,बीपी आदि से ग्रस्त हो

एक पैकेज ले भरी जवानी में

अग्निवीर हो

घर में बैठ जाता है

उसके बच्चे NRI हो विदेश बस जाते हैं

और अपने मां बाप को

मुम्बई और उसके आसपास खुल रहे

वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं।

 

आदिवासी,कोली लड़ रहे हैं

राजनेता,पुलिस,अदालत

उन्हें दिन रात हरा रही है

या हरा कर

उनसे हरा भरा जंगल

और समृद्ध समंदर छीन लिया है।

 

बॉलीवुड रामराज्य में

अवतरित हुए पाखंडी संतों से

भागवत कथा सुन

मोक्ष पा रहा है

बाज़ार में बिकने वाले

लेखक भगवान के होने

ना होने की बहस में

खुद को खपा रहे हैं

भावनाओं का बिंबात्मक दोहन

करने वाले शायर

बिना धरातल की भीड़ को

नज़्में सुना रहे हैं !

 

चारों ओर सांय सांय है

भीड़ अपने ही अंदर ग़ुम है

अपने को खोजती हुई नहीं

सिर्फ़ पेट भरने के लिए

दौड़ती हुई !

 

त्रासदी यह है कि

राजनैतिक कौम तमाशबीन हैं

मज़दूर वर्ग भिखारी से बदतर !

 

मुम्बई एक वैक्यूम है

इस वैक्यूम को कौन चलाता है

यह किसी को नहीं मालूम

क्योंकि उससे किसी का कोई लेना देना नहीं है

पूरी भीड़ का लेना देना है

सिर्फ़ रेंगते हुए

पेट भरने से !

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