कविता
पूँजी और नैतिकता का श्मशान-एपस्टीन फाइल
एम के आज़ाद
जब साम्राज्य
अपने सिर पर सभ्यता का ताज रखता है,
और पूँजी
अपने को नैतिकता का पुजारी घोषित करती है,
तभी महलों की दीवारों के पीछे
सड़ांध पकती है —
बिना शोर,
बिना शर्म।
तुमने देखा है न
वे चमकते चेहरे —
नेता, अभिनेता, उद्योगपति, धर्मोपदेशक —
जो लोकतंत्र की शपथ लेते हैं
और रात की उड़ानों में
अपना असली चेहरा पहनते हैं।
“एपस्टीन फाइल”
कोई काग़ज़ नहीं,
यह हमारे समय की चार्जशीट है।
इसमें दर्ज नाम
सिर्फ व्यक्ति नहीं,
एक पूरी व्यवस्था के दस्तख़त हैं।
यहाँ शक्ति
मांस की गंध से भीगती है,
धन
मासूमियत की कीमत तय करता है,
और देह
एक ‘डील’ में बदल दी जाती है।
स्कूल जाती लड़कियाँ —
जिनकी उम्र में
कविताएँ लिखी जानी चाहिए थीं,
उन्हें सौंप दिया गया
सूट-बूट की भूखी इच्छाओं के हवाले।
यहाँ स्त्री
देह है,
देह
मुनाफ़ा है,
और मुनाफ़ा
सबसे बड़ी नैतिकता।
तुम जो कहते हो —
“पूँजीवाद ने हमें सभ्य बनाया”,
जरा अपने हाथ देखो।
उन पर नोटों की स्याही नहीं,
बचपन की चीखें लगी हैं।
यह कोई दुर्घटना नहीं है।
यह वही है
जो लाभ की अंधी दौड़
आख़िरकार रचती है।
पूँजीवाद
जब अपने शिखर पर पहुँचता है
तो अपने ही अंतर्विरोधों में
सड़ने लगता है।
वह लोकतंत्र की भाषा बोलता है,
पर निर्णय
निजी द्वीपों पर होते हैं।
वह स्वतंत्रता का गीत गाता है,
पर श्रम और स्त्री दोनों को
बंधक बना लेता है।
और अब
उसे नंगा करने की ज़रूरत नहीं —
वह स्वयं
निर्लज्ज खड़ा है
अपने अपराधों की रोशनी में।
इतिहास ने
हर शोषक व्यवस्था को
उसकी ही कब्र तक पहुँचाया है।
प्रश्न यह नहीं
कि पूँजीवाद नैतिक है या नहीं।
प्रश्न यह है —
क्या मनुष्य
इस व्यवस्था में मनुष्य रह सकता है?
सर्वहारा,
यह समय क्रोध से अधिक
चेतना का है।
हर घोटाला,
हर खुलासा,
हर फाइल
तुम्हें पुकार रही है।
समय कह रहा है —
अब निर्णय लो।
कब्र खोदने का काम
नफरत से नहीं,
संगठित समझ से होता है।
इतिहास प्रतीक्षा नहीं करता।
और भविष्य
उन हाथों से बनेगा
जो डरते नहीं।
इसलिए बोलो,
संगठित होओ,
और ऐसी दुनिया रचो
जहाँ कोई मनुष्य
किसी “फाइल” में
कैद न हो।

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