कविता
बेहया का कथन
ओमप्रकाश तिवारी
बेहया को बेहया एकदम नहीं कहा जाना चाहिए
उसकी जीजीविषा का सम्मान किया जाना चाहिए
फेंक दो कहीं भी वह जड़ें अपनी जमा लेता है
ये कोई बेशर्मी नहीं, जीने की अदम लालसा है
मिल जाए अगर पोखर, झील या गढ़हे का पानी
फैल जाता है बेहिचक जहां तक फैला होता पानी
इसमें क्या बेहयायी, ये तो जिद जिंदा रहने की
जुनून चुनौतियों को धता बता हौसला रखने की
संदेश है निराश मन को खुदी को बुलंद रखने की
हारता वही सख्स जो दिमाग से हार मान लेता है
कहता है देखिए विसंगती में कैसे मुस्काया जाता
जेठ की तपती दोपहरी में कैसे हराभरा रहा जाता
कैसे फूल खिलते किस तरह खिलखिलाया जाता है
जब सूख जाती धरती, हवा भी हो जाती है गरम
सूरज जब आग बरसाता है तब भी रहते हम नरम
