कविता
फिल्म
ओमप्रकाश तिवारी
क्या कोई फिल्म
किताब हो सकती है?
कहानी, कविता या उपन्यास की तरह
जिसमें हो किस्सा
जो रची गई हो किस्सागोई से
जिसके संवादों के शब्द
चुने गए हों
गुलशन के फूलों की तरह
जिसमें हो स्पंदन
जीवों की धड़कन की तरह
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं
जिनके पात्रों से बन जाता है रिश्ता
जिनके हंसने से
चेहरे पर खिल जाती है मुस्कान
जिनकी परेशानियों से
परेशान हो जाता है दिमाग
जिनके रोने से
नम हो जाती हैं आंखें
रुंध जाता है गला
नायक नायिका का बिछोह
जेठ की दुपहरी की तरह
उतर जाता है जेहन में
उनकी संयोग की बेला पर
घिर आती हैं सावन की घटाएं
आंखों से होने लगती है रिमझिम
कपोल पर लुढ़की
आंसू की बूंदें
मुस्कराती हैं
खिलखिलाती हैं
गुलाब के फूल की तरह
जो बता जाती है
स्वाभिमान को बचाकर रखना चाहिए
अभिमान से
पैसा जरूरी है
पर उससे पहले जरूरी है
इनसान होना
जिसे प्यार करो पूरी सिद्दत से करो
माफ कर देना चाहिए
नफरत करने वाले को
ताकि वह भी बन सके
इनसान
गणित में इतने ना उलझ जाओ कि
जिन्दगी के रंग बदरंग हो जाए
और मर जाए अंदर का कलाकार
