ओमसिंह अशफाक – संगठन की बुनियाद रखने वालों में

ओमसिंह और यशोदा

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 96

 

ओमसिंह अशफाक – संगठन की बुनियाद रखने वालों में

 

सत्यपाल सिवाच

संभवतः आज के कार्यकर्ता इन्हें कर्मचारी नेता की तरह नहीं जानते, लेकिन 1986 में सर्वकर्मचारी संघ के गठन से पहले वे भावी आन्दोलन की नींव रखने वालों में शामिल थे।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के गैर शैक्षिक कर्मचारी 1980 से 1986 तक लगातार संघर्ष में थे; तीन बार बड़ी हड़ताल कर चुके थे; विश्वविद्यालय व जिला प्रशासन की दमनात्मक शैली और राज्य सरकार के अपमानजनक व्यवहार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया थी। सन् 1968 व 1973-74 के स्कूल अध्यापक/ कर्मचारी आन्दोलनों के बाद हुई फूट और निराशा की प्रतिक्रिया थी तथा केन्द्र में चौथा वेतन आयोग लागू होने के बाद उसे पाने की इच्छा आम कर्मचारी को अन्दर से झिंझोड़ रही थी।

संगठनों की फूट के बीच से नये नेतृत्व के अंकुर निकलने लगे थे। उस दौर में कुरुक्षेत्र में एफसीआई के कर्मचारी नेता ओमसिंह (जिन्हें साहित्यिक क्षेत्र में “अशफाक” नाम से जाना गया) ने नयी पहल की, नव प्रयोग किया – ट्रेड यूनियन कौंसिल, कुरुक्षेत्र का गठन। उसमें सभी सेक्शन्स की मांगें थी लेकिन तात्कालिक एजेंडा विश्वविद्यालय कर्मचारियों पर ढाए जा रहे जुल्मों का प्रतिकार करना था।

कई महीनों के प्रयास से शहर के सभी दफ्तरों व विभागों में राब्ता कायम हो गया; हड़ताली कर्मचारियों के समर्थन में छोटी-बड़ी गतिविधियां की जाने लगीं। समर्थन बढ़ता जा रहा था। इधर करनाल में भी ऐसी कौंसिल गठित हो चुकी थी। कुछ साल से सिरसा कर्मचारी संगठन भी केन्द्र-राज्य के सभी कर्मचारियों का मंच बना हुआ था। कुरुक्षेत्र ट्रेड यूनियन कौंसिल की ओर से 23 नवम्बर 1986 को कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के नॉन टीचिंग कर्मचारियों के समर्थन में राज्य- स्तरीय रैली के लिए अपील निकली; सभी संगठनों से संपर्क साधा; ट्रेड यूनियनों से सहयोग मांगा और रघुबीर सिंह हुड्डा, पृथ्वी सिंह और श्रद्धानंद सोलंकी आदि अनेक प्रबुद्ध राजनेता राह दिखाने लगे। ताबड़तोड़ रैली हुई और प्रशासन व सरकार की हवा निकल गई। यहाँ से निकला- सर्वकर्मचारी संघ के गठन का रास्ता। उससे पहले यूनिवर्सिटी में एस.एफ.आई. के राज्याध्यक्ष जसबीर सिंह की हत्या ने सब को उद्वेलित कर दिया था।

इन चंद पंक्तियों से ओमसिंह के व्यक्तित्व को सही संदर्भ में समझने के सूत्र पकड़ में आ सकते हैं। 1 नवम्बर 1949 को उत्तर प्रदेश के जिला बागपत(पहले मेरठ जिला) के दूहूण गोत्रीय कुरड़ी गाँव में श्रीमती बलवंती देवी और श्री बलजीत सिंह के घर साधारण किसान परिवार में एक बेटे का जन्म हुआ। ओमसिंह नाम दिया गया। संभवतः आर्य समाज के प्रभाव वाले क्षेत्रों में “ओम्” नाम का महत्व माना जाता होगा। तब माता – पिता ने नहीं सोचा होगा कि उनके सपूत में कितनी क्षमताएं हैं!

इस विषय में ओमसिंह से सीधे बात की। उनकी जुबानी उनके अनुभव सुनिए – “देश आज़ाद होने के पश्चात अनुमानतः दो साल बाद मेरा जन्म हुआ। बचपन की सबसे पहली जिस घटना की याद सालों बाद भी स्मृति में बची हुई है, वह है मेरी माँ का अपेक्षाकृत लंबी अवधि तक बीमार पड़ जाना, फलतः स्तनों में दूध सूख जाना और माँ के दूध से मेरा वंचित हो जाना। माँ स्वयं भी बाद तक इस घटना का ज़िक्र किया करती थीं। स्नेहिल पश्चाताप से कहतीं कि बीमारी के कारण असमय ही उसके बच्चे को दूध छोड़ना पड़ा। आर्थिक अभावों के बावजूद ये शायद प्रगाढ़ ममता ही थी जिसने मुझे समाज और दुनिया से आत्मीय गहराई तक प्यार करना सिखाया। बल्कि मुझमें कुछ हद तक अतिरिक्त भावुकता का संचार भी कर दिया था। छह-सात वर्ष की उम्र में स्कूल भेजा गया। फिर एक चारा-संकट आया तो डांगर-ढोर चराने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा। साल-दो साल जंगल में भटकने के बाद पुनः स्कूल में प्रवेश हुआ। शिक्षा पाने का अवसर भी देहाती-कस्बाई संस्थाओं में ही मिला। उस ग्रामीण माहौल में सेकेंड डिवीजन में पास होने का मतलब था—पढ़ाई में ‘होशियार’ होना। सो, विज्ञान विषय में दाखिला हो गया था। पढ़े जा रहे विषयों में रुचि-अरुचि का वहाँ कोई मतलब नहीं था। और न ही वैकल्पिक चुनाव के लिए मार्गदर्शन की व्यवस्था। इसी व्यवधानपूर्ण तरीके से स्नातक स्तर तक औपचारिक शिक्षा की गाड़ी खींचते-खिंचवाते सीमांत किसान परिवार की सांस फूल गयी थी।

जाहिर है उस परिवेश में बचपन भी कोई फूलों की सेज नहीं था। मई-जून की तपती-लू में घुटनों तक पाजामे चढ़ाकर पशुओं की पूँछ मरोड़ते हुए गाह्टा गाहणा, पाला़ पड़ती रातों में रहट-कोल्हू में जुते बैलों के पीछे दसियों कोस की चक्कर-घिनी खाना, वक्त-बेवक्त बर्फीले नहरी-पानी में घुसकर नाका मोड़ना, रात-बिरात खेतों की रखवाली करना, गेहूँ की फसल कटाई और ईख छुलाई आदि सभी कठोर काम बच्चों को भी करने पड़ते थे। फिर भी गाहे-बगाहे अन्न, धन, दूध और दवा का अभाव बना ही रहता था। पर, जीवन है कि हर हाल में जिंदा रहने के गुर खोज लेता है। सो, हम-उम्र बच्चे इकट्ठे होकर बिना खर्च-लागत का कोई-न-कोई खेल, खेल लेते। उस उल्लास में फौरी तौर पर कष्टों को भूल जाते और थककर सो जाते। अगले दिन से फिर वही नीरस दिनचर्या शुरू हो जाती। स्कूलों में अध्यापक भी उन दिनों खूब पिटाई करते थे। फिर भी गुरुओं और बड़ों के प्रति सम्मान, निम्न मध्यवर्गीय आदर्शवाद, समाज और राष्ट्र के प्रति एक नैतिक दायित्व का बोध न जाने कैसे विकसित हुआ कि आज तक चैन से नहीं बैठने दे रहा।”

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद ओमसिंह ने 1970 में बी.एससी. उपाधि ली और अक्टूबर 1971 में एफसीआई में नौकरी मिल गई। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के साथ पंजाब में जिला फिरोजपुर के फूड स्टोरेज डिपो, जीरा में पोस्टिंग हुई। दिसंबर माह में एक दिन दोपहर ढाबे पर खाने के लिए गए थे। पाकिस्तान के दो फाइटर जेट आए जिनके पीछे “इंडियन एयरफोर्स” के दो फाइटर जेट लगे हुए थे; गोदाम के ऊपर करीब 12 (?) बम गिराकर पाकिस्तान की ओर उड़ गए। धूल-धक्कड़ के गुब्बार से अंधेरा-सा छा गया। लगा कि धुएं का गुबार है। जब भण्डारण के पास गए तो वहाँ कई जगह सिलेंडर जैसी चीजें आधी जमीन में धंसी, आधी बाहर दिखीं। तुरंत डी.सी. फिरोजपुर केंट को टेलीग्राम से सूचना दी गई। कई दिन बाद में सेना की एक गाड़ी आई तो पता लगा कि वे अमेरिका निर्मित “बम” थे जो फटे नहीं और उनको “डिफ्यूज” करके सेना की टीम अपनी गाड़ी में लाद कर ले गयी है। वहाँ काम करते समय हवाई हमले का अंदेशा होते ही सायरन बजने पर, खोदे गए L type टरैंच में कूद जाया करते थे। “सिविल डिफेंस” वालों ने यह सब तरकीबें पहले ही समझा दी थीं।

हरियाणा रीजन अलग बनते ही तबादले के लिए रिक्वेस्ट दी तो मार्च’1972 में पंजाब से रोहतक में तबादला हो गया था। जून’1972 में सुश्री यशोदा से शादी हो गई। इसके बाद इनकी बदली दिल्ली हो गई लेकिन सब जगह लम्बी लाइनें देखकर तंग हो गए और दिल्ली से सोनीपत बदली करवा ली।

इससे पूर्व ओमसिंह 24 जून’1975 को “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा के जनक स्व. जयप्रकाश नारायण (JP) की “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!” उद्घोष रैली, रामलीला मैदान दिल्ली के प्रत्यक्षदर्शी भी बने हैं। जिसके बाद 25जून’ 1975 को देशभर में इमरजेंसी लगा दी गई थी।

इस बीच ओमसिंह यूनियन में सक्रिय हो चुके थे। वहां संगठन पर आर एस एस की सोच के लोगों का नियंत्रण था। उन्होंने मैनेजमेंट के खिलाफ भूखहड़ताल करने का निर्णय कर लिया। पंजाब के कुछ नेतृत्वकारी साथियों ने यूनियन के राष्ट्रीय-नेतृत्व की मंशा पर संदेह प्रकट करते हुए सवाल उठाए लेकिन उनको अनसुना कर दिया गया। भूख हड़ताल शुरू कर दी गई लेकिन “आर एस एस की विचारधारा” के लोग बीच में ही भूख हड़ताल छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे कर्मचारियों में मायूसी छा गई।

सन 1979 में राजपुरा (पंजाब) में नॉर्थ जोन की एक ‘जनरल कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन किया गया। कर्मचारियों के सामने सारी स्थिति का विश्लेषण और विवरण प्रस्तुत किया और आमसहमति से प्रस्ताव पास करके नयी “एफसीआई स्टाफ-यूनियन” का गठन कर दिया गया। ओमसिंह को उस यूनियन का हरियाणा क्षेत्र का स्टेट-सेक्रेटरी बनाया गया। नयी यूनियन के पंजाब के नेता मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के रुझान के थे।

ओमसिंह ने बताया कि उन दिनों एल.एम.जैन,IAS हरियाणा एफसीआई के सीनियर रीजनल मैनेजर (SRM) बन गये थे। हम परिचय बैठक के लिए गए तो बहुत देर तक प्रतीक्षा के बावजूद उन्होंने मिलने को नहीं बुलाया? क्यों नहीं मिल सकते- ये जानने के लिए हम उनके चेंबर में ही चले गए। खैर, वहां गरमा-गर्मी में अन्ततः बिना बातचीत ही लौटना पड़ा।..

नतीजतन इनकी बदली रोहतक से नारनौल कर दी गई और चार्जसीट दे दी गई। यहाँ पर सभी कर्मचारियों को जोड़ने के लिए नया प्रयोग – “जिला महेन्द्रगढ़ कर्मचारी-मजदूर महासंघ” का गठन करके किया। वहाँ नगर पालिका सफाई कर्मियों की हड़ताल हो गई। बाहर से समर्थन देखकर समझौते के लिए बुला लिया गया लेकिन भिवानी से आए एक सत्ताधारी बिचौलिए वाल्मीकि नेता ने कहा- ये दाढ़ी वाला समझौता नहीं होने देगा? अनुभवहीन सफाईकर्मी उसकी चाल को नहीं समझे और मीटिंग में कोई प्रतिवाद नहीं किया। तब डीसी और एसपी ने ओमसिंह को वार्ता से अलग करके बाद में सफाई कर्मियों को “झूठे आश्वासन” देकर हड़ताल खत्म करवा दी थी। इस बीच नारनौल में बिजली कर्मचारियों का भी आन्दोलन हुआ। उसमें सूरत सिंह यादव, अजीत सिंह आदि कई सक्रिय बिजली नेताओं से सहयोग किया और उनके धरने को संबोधित और समर्थन करने जाते रहे। साझा संघर्ष की परम्परा बन रही थी। वहाँ कामरेड देवकी नंदन, मास्टर बनवारीलाल अमीलाल, पालिका के कैलाश शर्मा आदि हर मौके पर साथ देते। कुलभूषण आर्य और वेद प्रकाश गौड़ से भी वहीं पर संपर्क और मित्रता हुई थी। वे क्रमशः मिल्क चिलिंग सेंटर और हरियाणा मिनरल्स कॉरपोरेशन में थे। अमर सिंह यादव(सेल टैक्स विभाग) जो बाद में हरियाणा कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष/महासचिव बने; नारनौल में हमारे कर्मचारी मजदूर महासंघ के ही सदस्य थे।

बाद में 1982 में ओमसिंह का ट्रांसफर नारनौल से चीका में हो गया था। वहाँ पर भी किसी न किसी रूप में सक्रियता रही और फिर 2 साल के भीतर ही सन् 1984 में वे चीका से कुरुक्षेत्र में आ गए।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आन्दोलन चल रहा था। लगातार सरगर्मियां थीं। कर्मचारियों के अलावा छात्रों व शिक्षकों में भी वाइस चांसलर की तानाशाही और राज्य सरकार की बेरूखी के खिलाफ आक्रोश पनप रहा था। अगले चुनाव में फिर से जीत हासिल करने की इच्छा से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री भजनलाल को केन्द्र में भेज दिया था और बंसीलाल को हरियाणा का मुख्यमंत्री बना दिया गया।

बंसीलाल सदैव मनमानी कार्यशैली व सख्ती के लिए जाने जाते रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन की मदद के लिए न केवल डीसी/एसपी को निर्देश दिए, बल्कि खुद ही कुंटिया(KUNTEA) के नेताओं को बातचीत के लिए पिपली रेस्टहाऊस में बुलाकर गिरफ्तार करवा दिया।

इधर ,प्रशासन से शह पाकर कुछ गुण्डा तत्वों ने छात्र नेता जसबीर सिंह की निर्मम हत्या कर दी थी। ओमसिंह के प्रयास से ट्रेड यूनियन कौंसिल बन चुकी थी। तेरह संगठनों के लोग बैठकों, एकजुटता कार्यवाहियों और गतिविधियों में भाग लेने लगे थे। यह नया संगठन विश्वविद्यालय के आन्दोलन को ही मदद देने का ही माध्यम नहीं बना, बल्कि राज्य में एक बड़े लड़ाकू संगठन- सर्व कर्मचारी संघ के गठन की नींव रखने वाला साबित हुआ।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के आन्दोलन के निपटारे के बाद सर्व कर्मचारी संघ का गठन हो गया। भले ही राज्य कर्मचारी न होने के कारण ओमसिंह उसकी ग्यारह सदस्यीय एक्शन कमेटी में नहीं थे, फिर भी उनसे निरन्तर परामर्श किया जाता रहा। लगभग चार महीने लम्बे संघर्ष में वे कई बार प्रशासन से भिड़े; जेल गए और उन्हें नौकरी से निलंबित करके उनका हेडक्वार्टर गुड़गांव बनाया गया था।

जेल-मैनुअल के अनुसार अंबाला जेल में सुविधाएं न मिलने के खिलाफ वहां बन्दी कर्मचारियों ने आन्दोलन चलाया तो ओमसिंह सहित सात लोगों को चक्कियों (isolation cells) में बंद रखा गया था। उनमें इनके अलावा बाबूराम गुप्ता व अम्बाला से ‘पाण्डेय’ उपनाम की याद है।

दूसरे कर्मचारियों की कुर्बानियां जानकर इनको अपना उत्पीड़न बहुत मामूली लगता है। इसलिए उल्लेख भी करना नहीं चाहते थे। उनके और बाबूराम गुप्ता के निलंबन के मामले का निपटारा मैनेजमेंट अलग होने के कारण देर से हो पाया था।

ओमसिंह की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ है। इसे देखते हुए उन्हें बोट क्लब पर हुई ऐतिहासिक कर्मचारी रैली में कई विपक्षी सांसदों के सम्बोधन को हिन्दी में अनुवाद करने का अवसर मिला। आन्दोलन के दौरान और बाद में जिले में सर्वकर्मचारी संघ को संगठन का रूप देने में भी इन्होंने महती भूमिका निभाई। यद्यपि 1988 के सितम्बर में विधिवत् चुनाव के बाद ओमसिंह सर्वकर्मचारी संघ का हिस्सा नहीं रह सके, क्योंकि वे राज्य के विभाग या किसी निकाय के कर्मचारी नहीं थे तथापि उन्होंने संगठन और संघर्षों के समय मदद जारी रखी।

वैचारिक दृष्टि से वे प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष विचारों के हैं। कामरेड सतबीर गोरड़ के माध्यम से सव्यसाची की कुछ पुस्तकें उन्हें मिलीं। समाजवाद क्या है, समाज कैसे बदलता है, समाज को बदल डालो, नौजवानों से आदि पढ़कर मार्क्सवाद की ओर रुझान हुआ तो कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, मार्क्स की पूंजी आदि मौलिक साहित्य भी पढ़ा। साथ ही साहित्यिक कृतियों उपन्यास- माँ (मैक्सिम गोर्की) अग्नि दीक्षा (निकोलाई ओस्ट्रोवस्की) युद्ध और शान्ति (लिओ टॉलेस्टॉय) और लू शुन की कहानियों ने गहराई प्रभावित किया। कबीर, रहीम, रसखान, निराला, प्रेमचंद, शरतचन्द्र जैसे भारतीय दिग्गजों के साहित्य को पहले ही पढ़ चुके थे। उसने आदर्शवादी जमीन तैयार की। सोनीपत में सतबीर गोरड़ और श्रद्धानन्द सोलंकी के सानिध्य से मार्क्सवाद की तरफ आकर्षित हुए। बदलती हुई परिस्थितियों में वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े; अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम में सोवियत संघ में समाजवाद को झटका लगने पर सक्रिय राजनीति से कुछ विश्राम लिया। कुछ समय साहित्यिक क्षेत्र में जनपक्षीय सृजन में गतिशील रहे। जनवादी लेखक संघ, हरियाणा के अध्यक्ष रहे और आधा दर्जन किताबें भी लिखी हैं।

अन्ना हजारे के आन्दोलन से इनका झुकाव आम आदमी पार्टी की ओर हुआ था। परंतु उसे बहुत प्रभावी न देखकर मौजूदा स्थिति में कांग्रेस से ही कुछ उम्मीद रखते हैं।

वे मूलरूप से प्रगतिशील हैं, जनपक्षीय हैं, धर्मनिरपेक्ष हैं और सामाजिक न्याय के पक्के समर्थक हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी बदलाव की तड़प उन्हें उद्वेलित करती रहती है।

ओमसिंह का घर आन्दोलन का मुख्य केन्द्र रहा है। उनकी जीवन संगिनी यशोदा ने बढ़चढ़ कर संघर्षों की मदद की है। यशोदा पहले कुरुक्षेत्र जिला स्तर पर जनवादी महिला समिति की संस्थापक-अध्यक्ष बनीं और फिर जनवादी महिला समिति, हरियाणा की संस्थापक प्रदेश-अध्यक्ष रही हैं और जगमती सांगवान संस्थापक-राज्य सचिव बनीं। दोनों ने महिला समिति के निर्माण में बड़ा योगदान दिया है। वे शुरुआती संगठन कर्ताओं में शामिल थीं।

इनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर है और हरियाणा गवर्नमेंट कॉलेज टीचर्स यूनियन का अध्यक्ष रहा है। बड़ी पुत्रवधू अंबाला में एक कॉलेज में पढ़ाती हैं। छोटा बेटा हरियाणा स्कूल शिक्षा विभाग में लेक्चरर/पीजीटी है और छोटी पुत्रवधू कुरुक्षेत्र में एक एजूकेशन कॉलेज में पढ़ाती हैं। तीसरी पीढ़ी में एक पोता-पोती हैं । पोता अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. के बाद UGC (NET) की तैयारी कर रहा रहा है और पोती 12वीं की छात्रा है। सन् 1984 से ही ओमसिंह सपरिवार कुरुक्षेत्र में स्थायी रूप से रह रहे हैं।(सौजन्य: उधम सिंह राठी)

लेखक- सत्यपाल सिवाच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *