अब जब बटन दबाकर अनुवाद हो सकता है
संजय कुमार सिंह
जनसत्ता में नौकरी के नाम पर मैं जो पत्रकारिता कर रहा था उसमें मजा नहीं आया तो मैंने अनुवाद करना चुना। मकसद यही था कि हिन्दी के पाठकों को वह सब दिया जाए जो आम तौर पर हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह मुफ्त का काम था, समाज सेवा की तरह। पैसे मैंने कॉरपोरेट के लिए अनुवाद करके कमाए। घऱ उसी से चलता रहा।
अब जब बटन दबाकर अनुवाद हो सकता है तो अनुवाद की जरूरत कहां रही लेकिन पाठक कैसे तय करें कि उन्हें क्या पढ़ना चाहिए। क्या हिन्दी के एक भी पाठक ने दैनिक जागरण पढ़ना छोड़ा? द हिन्दू पढ़ना शुरू किया? इंडियन एक्सप्रेस को हाथ भी लगाया। शायद नहीं।
इसलिए अनुवाद भले आसान हो जाए, अंग्रेजी या दूसरी किसी भाषा की कौन सी चीज पढ़ी जाए यह पाठक कैसे तय करेगा। इसपर कुछ करने की जरूरत लगती है। हिन्दी के पाठक काम (या लाभ) की चीजें पढ़ते होते तो बंगाल में भाजपा को नाक रगड़नी पड़ती? आईटी सेल पर छापा मारकर रणनीति तलाशने की मजबूरी होती? मुझे लगता है जमानत नहीं दिए जाने का समर्थन करने वालों को ये सब पढ़ना चाहिए। इसलिए पेश है। Vistasp Hodiwala की पोस्ट का अनुवाद,
“इस मुश्किल समय में जो कुछ भी सकारात्मक लगे उसे अपनाना चाहिए ताकि हमारी उम्मीदें पूरी तरह खत्म न हो जाएं। भले ही वे ऐसी जगहों से आएं जो पहले ही बहुत उम्मीद न बंधाती हों। सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से लटकी ज़मानत याचिकाओं को जब बेतुके ढंग से खारिज कर दिया तो अगली सुबह, कम से कम तीन राष्ट्रीय अखबारों के संपादकीय में कोर्ट के तर्क की साफ तौर पर आलोचना की गई और संवैधानिक गारंटी वाली नागरिक स्वतंत्रता के विचार को देश की सबसे बड़ी अदालत के जजों द्वारा लागू किए गए मानकों से कहीं और ऊंचे मानकों पर रखा गया।
जैसा कहा जाता है, छोटी-छोटी कृपा।
बस यही उम्मीद की जा सकती है कि जिन बहादुरों ने मिलकर यह लंबा-चौड़ा फैसला लिखा है, उन्हें समय मिले कि वे न सिर्फ इसे पढ़ सकें और समझें कि उनका फैसला कितना गलत व अन्यायपूर्ण है। इससे भी ज़रूरी बात यह समझना है कि इससे कोई भी बेवकूफ बनने वाला नहीं है। यहां तक कि वो भी नहीं जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने के लिए भी अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं।
अगर उन्हें भी इस फैसले की आलोचना करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, तो सोचिए उमर और शरजील के परिवार, दोस्त और शुभचिंतक कैसा महसूस कर रहे होंगे।”
पहला संपादकीय इंडियन एक्सप्रेस का है। शीर्षक है, दिल्ली दंगा मामले में जमानत आदेश गंभीर चिन्ता पैदा करता है। दूसरा द हिन्दू का है। शीर्षक है, भूमिकाओं का क्रम -सत्ता को किसी को लंबे समय तक कैद रखना सामान्य करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। तीसरा हिन्दुस्तान टाइम्स का है, जब प्रक्रिया ही सजा है। संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से साभार
