अमेरिका नहीं, ट्रंप खुद “ग्रेट” हो गए

बात बेबात

अमेरिका नहीं, ट्रंप खुद “ग्रेट” हो गए

 

विजय शंकर पांडेय

 

डोनाल्ड ट्रंप ने जब नारा दिया था “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन”, तब अमेरिका ने सोचा था कि सड़कें सोने की होंगी, नौकरी बारिश की तरह बरसेगी और टैक्स हल्के हो जाएंगे। लेकिन एक साल बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो तस्वीर दिखाई, उसमें अमेरिका नहीं, ट्रंप खुद “ग्रेट” हो चुके हैं—सीधे 1.4 अरब डॉलर (करीब 1,17,000 करोड़ रुपये) ज़्यादा ग्रेट!

व्हाइट हाउस उनके लिए सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि एटीएम निकला। हर फैसला ऐसा, जैसे बिज़नेस मीटिंग हो—देश बाद में, ब्रांड पहले। विदेश नीति भी कुछ-कुछ रियल एस्टेट डील जैसी रही, “आप तारीफ़ करो, मैं हाथ मिलाऊँगा। आप सवाल पूछो, मैं ट्वीट कर दूँगा।”

ट्रंप ने साबित कर दिया कि राष्ट्रपति पद कोई जिम्मेदारी नहीं, बल्कि फुल-टाइम साइड बिज़नेस हो सकता है। अमेरिका को ग्रेट बनाने का सपना था, लेकिन जागे तो देखा—ग्रेट सिर्फ बैंक बैलेंस हुआ है। जनता पूछ रही है, “हमारा फायदा?” जवाब आया, “आपको मोटिवेशन मिला—मेहनत करो, शायद अगला ट्रंप आप बनो!”

सबसे दिलचस्प बात यह कि समर्थक अब भी खुश हैं। वे कहते हैं, “कम से कम वो ईमानदार हैं, खुलकर कमा रहे हैं।” सच ही तो है—बाकी नेता छुपकर कमाते हैं, ट्रंप खुलेआम।

तो जनाब, अमेरिका भले ही वहीं का वहीं खड़ा हो, लेकिन ट्रंप इतिहास में दर्ज हो गए हैं—पहले ऐसे राष्ट्रपति के रूप में, जिन्होंने देश नहीं, खुद को सुपरपावर बना लिया।

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लेखक – विजय शंकर पांडेय

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