युद्ध के विरुद्ध युद्ध-21
कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।
प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है नितिन उपमन्यु की कविता – युद्ध । संपादक
युद्ध
नितिन उपमन्यु
जब युद्ध होते हैं
खुश होते हैं गिद्ध
लाशों के ढेर देखकर
ऊंची आवाज में बोलते हैं भेड़िये
मांस के लोथड़े देखकर
सिर्फ जीत के लिए
नहीं होते युद्ध
गिद्धों व भेड़ियों की खाल में छिपे
इंसानों की भूख शांत करने को
रचे जाते हैं युद्ध
मरने का भय दिखाकर
शांति का झूठा फैलाकर
लाखों लाशें बिछाने के लिए
लड़े जाते हैं युद्ध
अहंकार की तृप्ति के लिए
गढ़े जाते हैं युद्ध
दौलत कमाने के लिए
लड़े जाते हैं युद्ध
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