25 जनवरी 2026 को पत्रकारिता का एक चमकता सितारा दुनिया को अलविदा कह गया, नाम था मार्क टुली। भारत में जन्मे, पले मार्क टुली ब्रिटेन चले गए थे लेकिन वह फिर भारत लौट आए बीबीसी का पत्रकार बनकर। फिर आजीवन भारत में ही रहे, विशुद्ध भारतीय पत्रकार बनकर। वह भारतीय आत्मा के पत्रकार, खांटी भारतीय। उन्हें याद किया है वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन ने। प्रतिबिम्ब मीडिया श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए त्रिभुवन का लेख प्रकाशित कर रहा है । उनके प्रति आभार।
मार्क टुल्ली: जब एक आवाज़ ने माइक्रोफ़ोन छोड़ा, लेकिन भारत नहीं छोड़ा
त्रिभुवन
यह ख़बरों के महानायक की कहानी है, जो आज खबरों के अनश्वर संसार से सदा के लिए जीवित रहते हुए चला गया।
25 जनवरी 2026 को जब दिल्ली में ख़ामोशी कुछ ज़्यादा ही सलीके से फैली थी; जैसे शहर ने जानबूझकर अपनी आवाज़ धीमी कर ली हो। किसी परिचित स्वर का अचानक ग़ायब हो जाना, वैसा ही एहसास था। सर विलियम मार्क टुल्ली नहीं रहे। लेकिन यह वाक्य अधूरा है। सच यह है कि मार्क टुल्ली बहुत पहले यानी जुलाई 1994 में ही ख़बरों के लोक से परे हो गए थे, उस दिन, जब उन्होंने बीबीसी से बहुत क्षुब्ध होकर त्यागपत्र दे दिया था; लेकिन उसी क्षण उन्होंने एक नया ही जन्म लिया।
वे जेएलएफ में कई बार जयपुर आए तो बिना किसी मित्रता और बिना किसी पहचान के इतनी आत्मीयता से कोई घंटा भर बतियाते रहे। मार्क टुल्ली से उस मुलाकात ने साबित किया कि पत्रकार के भीतर का इनसान बड़ा होता है, सितारा छवि नहीं।
मार्क टुल्ली की मृत्यु कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं है; वह एक विराम है—एक ऐसा विराम, जिसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी में स्वयं बहुत पहले लगा दिया था। और जैसा कि उन्होंने “नो फुलस्टॉप्स इन इंडिया” में लिखा था, भारत में पूर्ण विराम होते ही नहीं। उनकी मृत्यु भी एक अपूर्ण वाक्य की तरह है, जो अब स्मृतियों में अपनी अनुगूंज बनाए रहेगा।
मैं बीबीसी का दीवाना रहा हूँ और सन् 1975 से, जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था।
1994। लंदन में बीबीसी के दफ़्तरों में चमकती हुई चुप्पियाँ थीं। जॉन बर्ट का युग, जहाँ प्रबंधन की भाषा में भय एक तकनीक था और गोपनीयता एक नीति। टुल्ली के लिए यह असहनीय था। वे उस पत्रकारिता से आए थे, जिसमें सवाल आदेश से ज़्यादा पवित्र होता है। उन्होंने कहा था, बीबीसी एक “गुप्त मोनोलिथ” बनती जा रही है, जहाँ रेटिंग्स की पूजा है और आत्मा निर्वासित। पत्रकारिता में आत्मा के निर्वासन का यह सिलसिला पत्रकारिता के महानतम शिखर से शुरू हुआ था और आज हम पूरी दुनिया में बिना आत्मा वाली देहें देख रहे हैं, जो प्रेत बन चुकी हैं।
उस इस्तीफ़े में कोई नाटकीयता नहीं थी, बस एक गहरी नैतिक थकान थी। यह वह क्षण था जब लेखक ने अपनी कलम नहीं, मेज़ छोड़ दी। माइक्रोफ़ोन से हटते हुए भी टुल्ली आवाज़ बने रहे।
भारत उनके लिए कोई पोस्टिंग नहीं था; वह एक स्मृति थी, जो बचपन से चली आ रही थी। कलकत्ता का टॉलीगंज, दार्जिलिंग का बोर्डिंग स्कूल, फिर इंग्लैंड, जहाँ भारत से दूर रखकर भारत सिखाया गया। यह इतिहास की विडंबना थी कि जिस देश से उन्हें सामाजिक दूरी पर रखा गया, उसी देश ने उन्हें सबसे निकट से अपनाया।
वे कहते थे, “इस देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है कि जब मैं हिंदी में बात करता हूँ तो लोग अंगरेज़ी में जवाब देते हैं।” यह शिकायत नहीं थी, यह पीड़ा थी, एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने भारत को भाषा से नहीं, संवेदना से सीखा था। और मैंने जब-जब उनसे बातचीत की थी, उसमें उनकी भाषा सुकून देती थी।
टुल्ली भारत को घटना की तरह नहीं, प्रक्रिया की तरह देखते थे। भोपाल गैस त्रासदी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिख-विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद का विध्वंस, ये उनके लिए समाचार नहीं, सभ्यता की दरारें थीं। 1992 में अयोध्या में जब भीड़ “डेथ टू मार्क टुल्ली” के नारे लगा रही थी, तब वे एक कमरे में बंद थे, न केवल शारीरिक रूप से, उस भारत के भीतर भी, जो स्वयं को बंद कर रहा था।
उन्होंने बाद में कहा था—बाबरी मस्जिद का गिरना स्वतंत्र भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वप्न की सबसे बड़ी पराजय थी। यह विश्लेषण नहीं था, यह एक शोक-वाक्य था। हम देख रहे हैं कि आज की पत्रकारिता में धर्म निरपेक्षता की वही पराजय एक नए विजयनाथ के रूप में प्रस्तुत की जाती है। आत्महीना पत्रकारिता इसके अलावा और करे भी क्या?

1994 के बाद उन्होंने बीबीसी छोड़ा, लेकिन भारत नहीं। वे दिल्ली में रहे, रेलगाड़ियों में भटके, गाँवों में रुके, रेडियो पर बोले, किताबों में साँस ली। “इन इंडिया इन स्लो मोशन” जैसे शीर्षक दरअसल उनके जीवन-दर्शन थे—भारत को जल्दी में समझा ही नहीं जा सकता।
उनकी दोस्ती चौधरी देवीलाल से महान् ज़मीनी नेता से थी और उस दोस्ती में भारतीय राजनीति का एक अनोखा हास्य छिपा था। एक बार चुनाव के दौरान देवीलाल ने उनसे कहा, “मैं बहुत बोर हो गया हूँ।” टुल्ली ने कहा—घोषणापत्र तो अच्छा है। देवीलाल हँसे, “बेवकूफ़, मैंने एक भी घोषणापत्र नहीं पढ़ा।” फिर जोड़ा, “लेकिन गाँव का हर आदमी मुझे जानता है।” टुल्ली इस वाक्य को लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा मानते थे।
उन्हें राजीव गांधी बेहद पसंद थे। उनका मानना था : अगर राजीव गांधी की हत्या न होती तो भारत कहीं आगे होता। “उन्हें पता था कि क्या करना है,” टुल्ली कहते थे—और उस वाक्य में अफ़सोस भी था, उम्मीद भी।
वे क्रिकेट में भारतीय टीम के समर्थक थे, बिना किसी औपचारिकता के। महेंद्र सिंह धोनी को उन्होंने पहली नज़र में पहचान लिया था। “मैंने तभी कह दिया था, यह लड़का बहुत आगे जाएगा।” यह कथन किसी क्रिकेट विश्लेषक का नहीं, किसी कथाकार का था, जो चरित्र पढ़ लेता है।
हिंदी फ़िल्मों से उनका प्रेम लगभग घरेलू था—ओंकारा, तारे ज़मीं पर, नया दौर। अमरीश पुरी, नसीरुद्दीन शाह, सैफ़ अली ख़ान, बोमन ईरानी—वे कलाकारों को उनके अभिनय से पहले उनकी आत्मा से देखते थे। अमरीश पुरी से जुड़ा एक सपना था—नाइटहुड मिलने पर उन्होंने कहा था कि वे किसी हिंदी फ़िल्म में छोटी भूमिका करना चाहते हैं, बस अमरीश पुरी हों। कुछ दिन बाद अमरीश का फ़ोन आया—और कुछ समय बाद उनका निधन। वह सपना अधूरा रह गया—जैसे टुल्ली की बहुत-सी इच्छाएँ।
उन्हें जाने कितने ही फिल्मी गीत याद थे। टुल्ली साहब को दक्षिणपंथी माना जाता था; लेकिन उनका पसंदीदा गीत था—सारे जहाँ से अच्छा, घनन घनन, धीमे-धीमे, आज रंग है—जैसे ये गीत नहीं, उनके निजी डायरी के पन्ने हों।
मार्क टुल्ली को “भारत को समझने वाला विदेशी” कहा गया। यह वाक्य उनके साथ अन्याय करता है। वे भारत को समझते नहीं थे—वे भारत में रहते थे। समझना दूरी माँगता है; रहना जोखिम।
1994 में उन्होंने बीबीसी को वैसे का वैसे बिना शोरशराबे छोड़ दिया और आज 2026 में उन्होंने अपने शरीर को जस की तस धर दीनी चदरिया।
बीच के वर्षों में उन्होंने हमें यह सिखाया कि पत्रकारिता संस्था से नहीं, विवेक से चलती है।
मार्क टुल्ली चले गए।
लेकिन भारत में—आज भी—कोई पूर्ण विराम नहीं लगा। मार्क टुल्ली दैहिक रूप से ज़रूर चले गए हैं; लेकिन उनकी आत्मा हमारी पत्रकारिता को सदैव समृद्ध करती रहेगी।
फोटो : पार्थिव शाह, राजकमल प्रकाशन और परवेज़ आलम साहब
