मंजुल भारद्वाज का लेख – स्त्री सक्षमता 

मंजुल भारद्वाज का लेख – स्त्री सक्षमता

मंजुल भारद्वाज

 

क्या है स्त्री सक्षमता ? शिक्षित हो जाना, पैसा कमाना या संपति अर्जित करना ! तो आज कम ज़्यादा यह स्त्री कर रही है पर क्या वो सक्षम है?

सबलीकरण या सक्षमता को नए सिरे से समझने की ज़रूरत है आज के प्रलयकारी काल में। हिंसा, युद्धोंमाद, धर्मांधता , शोषण, भेदभाव, अन्याय,असमानता के इस पूंजीवादी वर्चस्व के दौर में स्त्री सक्षमता, आत्मनिर्भरता की पुनर्व्याख्या अनिवार्य है!

स्त्री प्रेम,ममत्व,पालन पोषण,यौन सुख,सौंदर्य बोध और आत्मसमर्पण से पुरुष के पुरुषत्व को गौरवान्वित करती है और इसी बिंदु से वो सबला से अबला हो जाती है।

स्त्री इस संसार की मूल है,जड़ है ,पोषक है, सृजनकार है। शरीर के परे उसकी सृजन प्रकृति ही उसे सृजनकार बनाती है पर वो मां,पत्नी,बहन,बेटी के रूप में खप जाती है और समाज द्वारा गढ़ी गई स्त्री की व्याख्या को स्वीकार कर अपने सृजन स्वरूप को भूल जाती है!

स्त्री को खेती प्रक्रिया से सीखने की ज़रूरत है। ज़मीन जोतने,सींचने के बाद खेतिहर उसमें बीज बोता है। बिना बीज फ़सल पैदा नहीं होती सिर्फ़ खरपतवार उगता है।

आज मनुष्य शरीर लिए खरपतवार ही उग रहा है। स्त्री को प्रेम,पालन पोषण,ममत्व ,संबल ,यौन सुख और आत्म समर्पण पर नहीं रुकना है। उससे जो एकरूप होने की ज़मीन तैयार होती है उसमें इंसानियत, अहिंसा, समता, न्याय का बीजारोपण करना है ताकि पुरुषत्व की बजाय समता,सह – अस्तित्व और इंसानियत का उदय हो ।

स्त्री का मानवीय मूल्यों का सहेजना ही उसका सबलीकरण है। यही उसकी प्रकृति और प्राकृतिक विशेषता है। पैसा, संपति,शिक्षा और सत्ता तो पुरुष के पास है पर क्या पुरुष सक्षम है? नहीं। पुरुष सक्षम नहीं अपितु हिंसक और शोषक है वरना अपनी जन्म देने वाली को वो पांव की जूती नहीं समझता, घर की चारदीवारी में कैद नहीं करता, संपति से बेदखल नहीं करता, स्त्री के स्व को बलात्कार से विक्षिप्त नहीं करता, उसके गर्भ पर कब्ज़ा नहीं करता, उसकी योनि को कलंक नहीं समझता, उसकी यौन इच्छा पर चरित्र हीनता का ठप्पा नहीं लगाता! और सदियों से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की चक्की में नहीं पीसता !

आज हमें सक्षमता और सबलीकरण की नई परिभाषा गढ़ने की ज़रूरत है एक समतावादी,अहिंसावादी,शांतिप्रिय ,न्यायसंगत,विविध , सौहार्दपूर्ण और मानवतावादी दुनिया के लिए!

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