टांड़ पै बिठा दे

हरियाणवी लघुकथा

टांड़ पै बिठा द

रणबीर दहिया

एक बै एक छोरी भूखी रोवै थी। घर मैं रोटी थी कोण्या। उसकी माँ नै बहोत समझाई । पर बातां तैं के भूख भाजै थी। रोवणा कोण्या बन्द करया । वा और ठाड्डू रोवण लाग्गी। उसकी माँ नै दो धौल बी धर दिए फेर बी चुप कोण्या हुई छोरी। इतने मैं पड़ौसन आगी अर बोली,” नफे की बहू !या छोरी क्यूँ रूआ राखी सै?”

वा बोली,” रोटी मांगै सै।”

पड़ौसन बोली,” देंती क्यों नहीं ?”

माँ बोली, ” रोटी तै कोण्या ना ।”

पड़ौसन सोच साच कै बोली,” इसनै टांड पै बिठा दे । ”

माँ बोली,” टांड पै के रोटी धरी सैं?”

पड़ौसन बोली,” बिठा तो सई।”

माँ नै छोरी टांड पै बिठा दी।

छोरी टांड पै भी रोन्ती रही फेर उसनै रोटी मांगनी बन्द करदी अर बोली,” माँ मनै बस इस टांड पर तैं तार दे।

भूलगी रोटी नै ।

सोचियो!!!!!!!!

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