पुराने ख़ुतूत और दस्तावेजों में दर्ज इतिहास
सुधीर विद्यार्थी
क्रांतिकारी राधामोहन गोकुल के पौत्र श्री प्रकाश चंद्र अग्रवाल (आगरा) ने अपने पास उपलब्ध पुराने अखबारों के कतरनें, चिट्ठी-पत्री और राधामोहन जी की एक प्रारंभिक मूल डायरी सहित विपुल सामग्री मुझे सौंप दी है, जिसमें कानपुर में प्रथम कम्युनिस्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजक सत्यभक्त के 33 पत्र, कुछ चिट्ठियां मन्मथनाथ गुप्त, दादा धर्माधिकारी, स्वतंत्रता सेनानी अशोक बोस, शहीद चंद्रशेखर आज़ाद के सहयोगी भवानी सिंह रावत के पुत्र जगमोहन सिंह, डॉ. हरगोविंद सिंह की (जिन्होंने राधामोहन गोकुल के अंतिम दिन का संस्मरण लिखा था), सत्यभक्त की मंझली पुत्री लीला, नारायण प्रसाद अरोड़ा मेमोरियल सोसाइटी के साथ तथा इतिहास की अन्य महत्वपूर्ण और दुर्लभ सामग्री है।
प्रश्न यह है कि इन चीजों का इस अ-क्रांतिकारी समय में कहां उपयोग हो और इसे संरक्षित करने का सुयोग्य स्थान क्या हो सकता है। फिलहाल ऐतिहासिक महत्व की यह समस्त वस्तुएं मेरे निजी संग्रह को समृद्ध करेंगी। इन्हें क्रमबद्ध और संयोजित करना श्रमसाध्य कार्य होते हुए भी मुझे इसमें मुझे दिलचस्पी है।
मैं सुपरिचित हूं कि प्रकाश चंद्र जी युवावस्था से ही राधामोहन गोकुल की कीर्ति-रक्षा के लिए निरन्तर प्रयासरत रहे और आज भी वे इस ओर अति गंभीरता से संलग्न हैं। इस काम में उन्होंने कभी कोई ढिलाई नहीं बरती और अपने धन का भरपूर व्यय किया। राधामोहन गोकुल की रचनाओं के अनेक संकलन उनके मुक्त सहयोग से ही प्रकाशित हो सके।
सत्यभक्त जी इस मिशन में उनके हरदम सहयोगी बने रहे। करीब तीन दशक पहले मैंने उनके परिवार के साथ बुंदेलखंड में हमीरपुर ज़िले के खोही गांव जाकर राधामोहन गोकुल की समाधि की खोज की थी, जहां 1934 में गुप्त क्रांतिकारी कार्य करते हुए उनका निधन हुआ था।
बाद को मैंने एक बार राठ पहुंचकर खोही की बस्ती में मोड़ पर इस विप्लवी की स्मृति में शिलालेख लगवा दिया। मेरे प्रयासों से आगरा के केंद्रीय कारागार में राधामोहन गोकुल के नाम से एक बैरक का नामकरण, शिलापट्ट और चित्र लग सका। यह मेरे लिए संतोष की बात है।
डॉ. रामविलास शर्मा और सत्यभक्त के बाद कर्मेंदु शिशिर आदि ने राधामोहन जी के लिए काम किया, पर असल प्रश्न यह है कि उनकी क्रांतिकारी और नास्तिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार किस तरह हो ?
वर्तमान समय में यह सवाल और भी बड़ा होकर हमारे सम्मुख आ खड़ा होता है। मैंने दो बार खोही की यात्रा की, जहां आस-पास के लोग भी राधामोहन जी के नाम से सर्वथा अपरिचित हैं। क्रांतिकारी नारायण प्रसाद अरोड़ा, अर्जुन अरोड़ा, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा, डॉ. हरगोविंद सिंह आदि उनके योगदान से सुपरिचित थे।
कानपुर प्रमुख रूप से क्रांतिकारियों और राधामोहन जी का केंद्र रहा, लेकिन इस शहर ने भी उन्हें याद करने में कोताही की। विचारों और कलम के धनी राधामोहन गोकुल में इन्कलाब की जबरदस्त आग थी जिसने तत्कालीन भारतीय क्रांतिकारी संग्राम को खूब ऊष्मा दी।
वे अनोखे ढंग के सतत विप्लवी थे!
सुधीर विद्यार्थी के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक- सुधीर विद्यार्थी
